पूर्व एयर वाइस मार्शल का कहना है कि यूक्रेन को लड़ाके नहीं मिल रहे हैं। उसने अपने यहां सैनिक से लेकर ड्राइवर तक की भर्तियां निकाल रखी हैं, लेकिन युवा पीछे हट रहे हैं। दूसरी तरफ, रूस ने अपने सभी मोर्चों से सैनिकों को बुलाकर मुख्य ध्यान यूक्रेन पर केंद्रित कर दिया है। यूक्रेन की जनता को लगने लगा है कि इस लड़ाई में केवल तबाही है। इसलिए वह ऊब रही है। एनबी सिंह कहते हैं कि यूक्रेन, ताइवान समेत कई देशों में अमेरिका सहायता देता है, लेकिन इस सहायता का फायदा अमेरिकी कंपनियों को ही हो रहा है। उनके साजो-सामान, हथियार बिक रहे हैं। अब यूक्रेन के लोगों को लगने लगा है कि रूस के मुकाबले में उनकी लड़ाई न तो यूरोप लड़ने वाला है और न अमेरिका। खुफिया और सुरक्षा एजेंसी के पूर्व प्रमुख रहे सूत्र का भी कहना है कि दुनिया ने बड़ी लड़ाई लड़ ली है। अब थोड़ा शांति की बात होनी चाहिए। पूर्व मेजर जनरल का कहना है कि अमेरिका पर अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने का बहुत बड़ा दबाव है।
इस्राइल-ईरान की प्रतिक्रिया केवल दिखावे की थी
खुफिया और सुरक्षा एजेंसी से जुड़े सूत्र का कहना है कि इस्राइल के अत्याधुनिक हथियारों और सैन्य क्षमता के आगे ईरान की ताकत काफी कम है। फिर इस्राइल के साथ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस खड़े हैं। इसका कुछ मतलब है। जबकि ईरान के साथ कोई खुलकर सीधे लड़ने के लिए आने की मंशा नहीं दिखा रहा है। ईरान को भी पता है कि इससे अंत में उसके लोगों की ही परेशानी बढ़ेगी। एनबी सिंह कहते हैं कि रूस में यूक्रेन अभी अपनी लड़ाई लड़ रहा है। रूस के पास बाहर निकलकर दूसरे के लिए युद्ध लड़ने की स्थिति नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था अपने बुरे दौर से गुजर रही है। चीन इन्हें संभालने में लग गया है। चीन को भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था में अपना खतरा भी दिखाई दे रहा है। इसलिए चीन, रूस जैसे देश अमेरिका पर युद्ध न थोपने का दबाव तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन अगले पांच सालों तक चाहे ताइवान हो या कोई और मोर्चा, चीन युद्ध जैसे हालात से भरसक बचने की कोशिश करेगा।
एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह और रिटायर्ड मेजर जनरल दोनों का कहना है कि एक अप्रैल को सीरिया स्थित ईरान के वाणिज्यिक दूतावास परं इस्राइल के हमले का अर्थ कुछ और था। इसकी प्रतिक्रिया में 13 अप्रैल को ईरान की मिसाइल, ड्रोन से कार्रवाई अपनी जनता का गुस्सा शांत करने के लिए थी। इतना ही नहीं ईरान के हमले की प्रतिक्रिया में इस्राइल ने भी ईरान पर कोई बड़ा और भीषण जवाबी हमला नहीं किया। यह एक तरह से संदेश देने भर के लिए था। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि उन्हें पश्चिम एशिया में किसी बड़े उथल-पुथल की संभावना कम दिखाई दे रही है।
पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल बलविंदर सिंह संधू का कहना है कि लाल सागर में गतिरोध बढ़ा हुआ है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हैं। राष्ट्रपति जो बाइडेन के ऊपर भी दबाव बढ़ रहा है। ईरान के राष्ट्रपति ने भी कोशिशें तेज कर दी हैं और अमेरिका के सामने अपने व्यापारिक, कारोबारी हितों को लेकर चुनौती बढ़ रही है। इसलिए सब ठीक रास्ते पर आने की संभावना है।
लेकिन इस्राइल के लिए आसान नहीं हिजबुल्ला
भारतीय रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि दो देशों (इस्राइल और ईरान) के बीच में जंग के आसार तो बहुत कम हैं, लेकिन स्लिंटर (रेडिकल) ग्रुप जैसे हमास, हिजबुल्लाह के खिलाफ इस्राइल की कार्रवाई जारी रहेगी। एनबी सिंह कहते हैं कि हमास, हिजबुल्ला खत्म होने वाले नहीं हैं। इसी तरह के तमाम और रेडिकल ग्रुप हैं। यह खत्म होने के पहले या तो अपना नाम बदल लेते हैं या फिर कोई नया ग्रुप पैदा हो जाता है।