रईसी ने चुनाव जीतने के बाद अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि ईरान और सऊदी अरब एक दूसरे के यहां यहां अपने दूतावास फिर खोलें, इस रास्ते में कोई बाधा नहीं है। उन्होंने कहा था कि ईरान सऊदी अरब के साथ फिर से हाथ मिलाने को तैयार है। गौरतलब है कि ईरान शिया देश है, जबकि सऊदी अरब में बहुसंख्यक आबादी सुन्नी है। जनवरी 2016 में दोनों के संबंध तब बहुत बिगड़ गए थे, जब सऊदी अरब ने शिया मौलवी निमर अल-निमर को फांसी पर चढ़ा दिया। इससे ईरान में गुस्सा भड़का। तब तेहरान स्थित सऊदी दूतवास और मशाद शहर में मौजूद सऊदी वाणिज्य दूतावास पर भीड़ ने धावा बोल दिया था। उसके बाद दोनों देशों के राजयनिक संबंध टूट गए।
तब से हाल तक ईरान ने उन हमलों के लिए कभी माफी नहीं मांगी थी। लेकिन कुछ समय पहले ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने उन घटनाओं की जांच के आदेश दिए थे। उसके बाद हमलों में शामिल 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया। बताया जाता है कि इससे सऊदी अरब की भावनाओं पर मरहम लगा है।
सऊदी अरब और ईरान में बढ़े तनाव का असर यमन के गृह युद्ध पर भी पड़ा, जहां सुन्नी राष्ट्रपति के खिलाफ शिया आबादी ने बगावत की हुई है। सीरिया के गृह युद्ध में भी ईरान और सऊदी अरब आमने-सामने खड़े रहे हैं। इसलिए पर्यवेक्षकों का कहना है कि सऊदी अरब और ईरान के बीच समझौता हुआ, तो उसका असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ेगा। इससे इस्राइल की गणनाएं भी गड़ब़ड़ा सकती हैं। इस्राइल सऊदी अरब से संबंध सुधारने में जुटा रहा है। लेकिन नई परिस्थितियों में हो सकता है कि उसके ये प्रयास निष्फल हो जाएं।