मानवाधिकारों के हनन के मुद्दे पर श्रीलंका पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है। उसके मानवाधिकार रिकॉर्ड की जांच करने के लिए शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर श्रीलंका आएंगे। वे यहां तीन दिसंबर तक रहेंगे। इस दौरान श्रीलंका में मजदूरों, खास कर बाल मजदूरों के गंभीर शोषण के आरोपों की जांच करेंगे। ऐसी किसी जांच के लिए विशेष रैपोर्टियर तोमोया ओबोकाता की किसी देश की यह पहली यात्रा है।
ब्रिटेन ने अपनी ये रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) को सौंपी है। यूएनएचआरसी ने बीते मार्च में श्रीलंका के बारे में एक प्रस्ताव पारित किया था। उसमें श्रीलंका में मानवाधिकारों की हालत को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी। साथ ही उस प्रस्ताव में मानव अधिकार उल्लंघन के मामलों में जवाबदेही तय करने पर जोर दिया गया था।
अब ब्रिटेन के विदेश, कॉमनवेल्थ, और विकास कार्यालय ने मानव अधिकार और लोकतंत्र के बारे में अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की है। इसमें श्रीलंका के बारे में कहा गया है- ‘सुरक्षा बलों ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की निगरानी और उन्हें डराने-धमकाने की गतिविधियों में बढ़ोतरी कर दी है। कई लोगों को मनमाने ढंग से गिरफ्तर किया गया है। सरकार ने नए नियम प्रस्तावित किए हैं, जिनके तहत बिना न्यायिक निगरानी के किसी को भी गिरफ्तार करने और उसे डि-रैडिकलाइज करने के लिए पुनर्वास केंद्रों में भेजने के अधिकार उसने हासिल कर लिए हैं।’
श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इस साल हत्या के मामले में सजायाफ्ता हुए एक मुजरिम को क्षमादान दे दिया था। साथ ही सरकार ने स्वतंत्र संस्थाओं के प्रमुख के रूप में विवादित लोगों की नियुक्ति की। साथ ही आरोप है कि श्रीलंका सरकार लगातार तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ कदम उठा रही है। इन समुदायों के कई संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। सरकार के इन कदमों ने दुनिया भर में चिंता पैदा की है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी वजह से श्रीलंका मानवाधिकार संगठनों की चिंता का केंद्र बना हुआ है।