बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र के लिए आमंत्रित किया गया है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से द्विपक्षीय यात्रा का निमंत्रण भी दिया गया है। लेकिन ढाका अब तक इस यात्रा का फैसला नहीं कर पाया है। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय का कहना है कि यात्रा के लिए अनुकूल माहौल बनना जरूरी है और शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। यह पूरा घटनाक्रम शेख हसीना के साथ ही जमात-ए-इस्लामी फैक्टर से जुड़ा हुआ है। रहमान की दुविधा केवल यह नहीं है कि भारत से उन्हें क्या हासिल करना है। उन्हें यह भी देखना है कि भारत के साथ किसी बड़े मेलमिलाप की घरेलू राजनीतिक कीमत कितनी होगी।
जमात एक बड़ी ताकत
जमात को भारत से क्या एतराज है?
जमात का रुख यह नहीं है कि वह भारत से संबंध तोड़ना चाहती है। पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भारत के साथ पारस्परिक सम्मान और निष्पक्षता के आधार पर संबंधों की बात की थी। समस्या भारत के साथ संबंधों की शर्तों और पुराने राजनीतिक अविश्वास की है। जमात ने हाल के महीनों में भारत के खिलाफ कई मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया है। इनमें सीमा पर बीएसएफ के साथ हुए विवाद और जल बंटवारा प्रमुख हैं। जून में जमात की अगुवाई वाले 11-दलीय विपक्षी गठबंधन ने बीएसएफ पर बांग्लादेशी नागरिकों की हत्या का आरोप लगाया था।
तारिक रहमान की दुविधा
तारिक रहमान के सामने अब दो विकल्प हैं। पहला, भारत के साथ व्यावहारिक संबंध का रास्ता है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, व्यापार, सीमापार संपर्क और कनेक्टिविटी के लिए भारत को नजरअंदाज करना मुश्किल है। दूसरा घरेलू राष्ट्रवादी राजनीति का विकल्प है। शेख हसीना को भारत में शरण मिलने और उनके प्रत्यर्पण की मांग के कारण यह मुद्दा अब बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में बेहद संवेदनशील बन गया है। ढाका खुले तौर पर भारत से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है और इसे दोनों देशों के तनाव का प्रमुख कारण बता रहा है। यहीं जमात का दबाव काम कर रहा है। अगर तारिक हसीना पर किसी ठोस आश्वासन के बगैर दिल्ली आते हैं और पीएम मोदी के साथ गर्मजोशी से मिलते हैं, तो जमात के लिए यह आरोप लगाना आसान होगा कि बीएनपी सरकार झुक गई है। इससे जमात-ए-इस्लामी भारत-विरोधी भावनाओं का घरेलू राजनीति में प्रभावी इस्तेमाल कर पाएगी। इसके उलट यदि तारिक दिल्ली जाने से पहले हसीना के प्रत्यर्पण पर कड़ा रुख बनाए रखते हैं, तो वे विपक्ष की आलोचना के सामने अपनी राजनीति मजबूत कर सकते हैं। इसी मजबूरी के कारण ढाका की ओर से ‘अनुकूल माहौल’ बनाने की मांग सामने आ रही है।
भारत की चुनौती
भारत की चुनौती यह है कि बीएनपी सरकार घरेलू राजनीति और भारत के साथ अपने रणनीतिक हितों के बीच संतुलन कैसे बना सकती है। बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने भी तारिक की भारत यात्रा की उम्मीद जताई है। भारत की रणनीति तारिक को भारत के साथ संवाद की मेज पर लाना है। लेकिन तारिक रहमान को यह साबित करना होगा कि भारत से बेहतर संबंध बनाना स्वतंत्र विदेश नीति के कारण है, न कि किसी भारतीय दबाव का नतीजा है। यही वजह है कि ब्रिक्स का निमंत्रण अब साधारण कूटनीतिक निमंत्रण नहीं रह गया है, बल्कि तारिक सरकार की घरेलू राजनीति का बड़ा परीक्षण बन गया है।
तीस्ता मुद्दे पर भारत से संबंध नहीं बिगाड़ेंगे- बांग्लादेशी मंत्री