बीसीजी टीका पशुओं में मौजूद टीबी के विषाणु से तैयार होता है और 1921 से ही इसका इस्तेमाल हो रहा है। इसे छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित माना जाता है, लेकिन यह ज्यादा असरकारक साबित नहीं हुआ। यह छोटे बच्चों को टीबी से बचाता है, लेकिन उनकी उम्र बढ़ने के साथ इसका असर कम होने लगता है।
वयस्क होने पर यह फेफड़ों के संक्त्रस्मण से सुरक्षा करने में कारगर नहीं है, जबकि टीबी से होने वाली मौतों का यही सबसे बड़ा कारण है।
विशेषज्ञों को बड़ी उम्मीदें
विशेषज्ञ इस शोध के नतीजों से काफी आशान्वित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के टीबी प्रोग्राम्स के पूर्व डाटरेक्टर मारियो सी रेविग्लियोन का कहना है कि इसका इंसानों पर परीक्षण किया जाना चाहिए। यदि नतीजे बंदरों की तरह ही रहे, तो यह बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
वहीं, कुछ अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इंसान के खून में जीवित विषाणु को पहुंचाने से पहले परीक्षण और सुरक्षा उपायों की जरूरत है। यह एचआईवी पीड़ित मरीजों के लिए खतरनाक हो सकता है।
शोध करने वाली टीम ने टीके का असर कब तक बरकरार रहेगा, इस बारे में भी कुठ नहीं बताया। बंदरों का परीक्षण टीका देने के छह महीने बाद किया गया था। शोध के दौरान बंदरों को छह समूहों में बांटा गया था। पहले समूह को बीसीजी टीके का सामान्य डोज त्वचा के जरिये दिया गया।
दूसरे समूह को टीका इसी तरह से दिया गया लेकिन डोज ज्यादा रखा गया। तीसरे समूह को टीका इन्हेल (नाक से सूंघकर) करने को दिया गया।
चौथे समूह को इंजेक्शन के साथ इन्हेलर दिया गया। पांचवें समूह को नसों के जरिये टीका दिया गया जबकि छठे को कोई टीका नहीं लगाया गया।
छह महीने के परीषण के बाद शोधार्थियों को पता चला कि केवल नस के जरिये टीके लगाने वाले बंदरों की हालत में ही सुधार हुआ।
पहले भी हुआ शोध
1960 के दशक में विलियम आर बारक्ले और एडगर ई रिबी ने नस के जरिये बीसीजी का टीका लगाने का प्रयोग किया था। उन्होंने बंदरों पर इसका परीक्षण किया था और बताया था कि यह सुरक्षित तरीका है। हालांकि, उन्होंने आगे इस पर शोध नहीं किया।