मुद्रास्फीति दर बढ़ने का आलम यह है कि अब इससे धनी देशों में भी परेशानी महसूस की जा रही है। यूरोपियन यूनियन की सांख्यिकी एजेंसी यूरोस्टैट ने पिछले हफ्ते बताया था कि यूरो ज़ोन में सितंबर में महंगाई दर 13 साल से सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। वहां मुद्रास्फीति दर बढ़ने के पीछे प्रमुख कारण प्राकृतिक गैस के दामों में आया उछाल है। यूरोस्टैट ने बताया कि 2008 में आई आर्थिक मंदी के समय महंगाई में ऐसी बढ़ोतरी देखने को मिली थी। उसके बाद 13 साल तक आम तौर पर महंगाई काबू में रही।
यूरोस्टैट के आंकड़ों के मुताबिक यूरो ज़ोन में खाद्य पदार्थों, अल्कोहल और तंबाकू के दाम में भी इजाफे का रुख है। इसका असर यूरो ज़ोन की वार्षिक मुद्रास्फीति दर पर पड़ा है, जो अब बढ़ कर 3.4 फीसदी हो गई है। यूरो जोन में मुद्रास्फीति की इतनी ऊंची दर 2008 के बाद कभी नहीं देखी गई। अमेरिका में भी हाल के महीनों में महंगाई दर में तेज वृद्धि देखने को मिली है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये वैश्विक ट्रेंड है, जिस पर फिलहाल काबू पाए जाने की उम्मीद नजर नहीं आती।
यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने अनुमान लगाया है कि यूरो जोन में वार्षिक मुद्रास्फीति दर इस बार चार फीसदी तक पहुंच जाएगी। उसकी एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अगले साल भी इसमें कोई कमी आने की संभावना नहीं है।