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बाइडन का इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज फेल हुआ तो जलवायु लक्ष्यों को लगेगा धक्का, पेरिस समझौते का नहीं कर पाएगा पालन

Tue, 08 Jun 2021 04:37 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

बाइडन प्रशासन इस पैकेज पर सहमति बनाने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के साथ बातचीत कर रहा है। लेकिन उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। रिपब्लिकन पार्टी को इन्फ्रास्ट्रक्चर की परिभाषा में कई कल्याणकारी योजनाओं को भी शामिल करने पर आपत्ति है...
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : PTI (फाइल फोटो)
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विस्तार
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अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन के इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज के गतिरोध का शिकार हो जाने का असर सारी दुनिया पर पड़ेगा। जानकारों ने कहा है कि बाइडन के पैकेज में जलवायु परिवर्तन रोकने से संबंधित परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा है। अगर इन्हें लागू किया गया, तो उससे दूसरे देशों में भी ऐसे कारोबार को बढ़ावा मिलेगा, जिनमें कम कार्बन उत्सर्जन होगा। साथ ही अगर अमेरिका को पेरिस संधि के मुताबिक अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करनी है, तो वह भी तभी मुमकिन है, जब ग्रीन परियोजनाएं लागू होंगी। फिलहाल, रिपब्लिकन पार्टी के विरोध और डेमोक्रेटिक पार्टी में पड़ी फूट के कारण अमेरिकन जॉब्स प्लान नाम से पेश इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज लटक गया है।

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बाइडन प्रशासन इस पैकेज पर सहमति बनाने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के साथ बातचीत कर रहा है। लेकिन उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। रिपब्लिकन पार्टी को इन्फ्रास्ट्रक्चर की परिभाषा में कई कल्याणकारी योजनाओं को भी शामिल करने पर आपत्ति है। साथ ही उसे इस पैकेज के लिए जुटाने के मकसद से धनी लोगों और बड़ी कंपनियों पर टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी एतराज है। इस पैकेज के तहत राष्ट्रपति बाइडन ने इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रिड टेक्नोलॉजी, जन परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा आदि जैसे कई क्षेत्रों में निवेश और टैक्स रियायत देने का प्रस्ताव रखा है।

संयुक्त राष्ट्र का अगला जलवायु सम्मेलन इस साल नवंबर मे होगा। वहां अमेरिका को कार्बन उत्सर्जन घटाने संबंधी अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी। गौरतलब है कि बाइडन ने राष्ट्रपति बनने के बाद जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हुई पेरिस संधि में अमेरिका को फिर से शामिल किया है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संधि से अमेरिका को बाहर निकाल लिया था।
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पर्यावरणवादी संस्था एनवायरॉनमेंट डिफेंस फंड के कार्यकर्ता नैथेनिएल कियोहेन ने अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा- ‘जलवायु मामले में अमेरिकी नेतृत्व बहुत अहम है। इसलिए बाकी सारी दुनिया की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं कि कैपिटॉल हिल (अमेरिकी संसद) में क्या होता है।’ उन्होंने कहा- ‘अमेरिकी जितना अधिक नेतृत्व क्षमता दिखाएगा, हम देखेंगे कि बाकी दुनिया उसी अनुपात में जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन ये नेतृत्व सिर्फ उत्सर्जन रोकने संबंधी महत्त्वाकांक्षा जताने में नहीं, बल्कि उस पर गंभीरता से अमल में भी दिखाना होगा।’

बीते अप्रैल में अमेरिका ने एलान किया था कि वह पेरिस संधि के तहत 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन में 2005 की तुलना में 50 फीसदी की कटौती करेगा। जानकारों का कहना है कि अगर इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज के तहत घोषित परियोजनाएं लागू नहीं हुईं, तो इस लक्ष्य को पाना संभव नहीं होगा। थिंक टैंक एटलांटिक काउंसिल से जुड़ी मार्गरेट जैक्सन के मुताबिक अगर बाइडन प्रशासन घोषित लक्ष्य हासिल कर पाया, तो बहुत से दूसरे देश भी पेरिस संधि के लक्ष्यों के मुताबिक कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित होंगे। लेकिन उन्होंने कहा कि अमेरिका के सहयोगी देशों को भी इस पर शक है कि बाइडन प्रशासन ऐसा कर पाएगा।

विश्लेषकों के मुताबिक रिपब्लिकन पार्टी के विरोध के बावजूद डेमोक्रेटिक पार्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज को पास कराने की स्थिति में है। उसके पास 100 सदस्यीय सीनेट में 50 सदस्य हैं। साथ ही उप राष्ट्रपति का एक अतिरिक्त वोट भी उसके साथ है। लेकिन बाइडन प्रशासन की मुश्किल यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के दो सीनेटर जो मेंचिन और क्रिस्टेन सिनेमा के वोट को लेकर वह निश्चिंत नहीं है। इसलिए वह रिपब्लिकन पार्टी के साथ द्विपक्षीय सहमति बनाने में जुटा हुआ है।

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