दुनिया की लगभग आधी आबादी के पास डायबिटीज, हाइपरटेंशन, एचआईवी और टीबी जैसी बीमारियों के लिए बुनियादी निदान (डायग्नोस्टिक) तक पहुंच नहीं है। यह दावा दि लैंसेट कमीशन ऑन डायग्नोस्टिक्स द्वारा किए गए एक विश्लेषण में किया गया है। इसके लिए कमीशन 16 देशों के 25 विशेषज्ञों को साथ लाया, जिन्होंने पाया कि सटीक, उच्च गुणवत्ता और किफायती निदान तक पहुंच के बिना कई लोगों का अधिक इलाज होगा, कम इलाज होगा या बिल्कुल नहीं होगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी का शुरुआती सबक समय से और सटीक निदान के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। रिपोर्ट के अनुसार उच्च आय वाले देशों में निजी क्षेत्र के अतिरिक्त मौजूद वर्तमान स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं के इस्तेमाल की क्षमता, जांच की क्षमता को बढ़ाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। इन बुनियादी सेवाओं तक पहुंच न रखने वाले कई निम्न और मध्य आय वाले देश वंचित थे और जांच की अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में असमर्थ थे।
इस रिपोर्ट में चुनौतियों के चौंकाने वाले पैमाने को दर्शाया गया है। कमीशन के अध्यक्ष और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के केनेथ फ्लेमिंग ने इस पर कहा, दुनिया के अधिकतर हिस्सों में प्रमुख नैदानिक परीक्षणों और सेवाओं तक पहुंच के अभाव में रोगियों का इलाज किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह आंख बंद करके मेडिकल प्रैक्टिस करने जैसा है। इससे न केवल रोगियों को नुकसान पहुंचने की बहुत आशंका है बल्कि यह यह दुर्लभ चिकित्सा संसाधनों की एक बड़ी बर्बादी भी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान राजनीतिक और वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडे में जांच को सबसे ऊपर रखा गया है। यह सभी बीमारियों के निदान को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होना चाहिए। निदान या डायग्नोस्टिक में प्रमुख जांच और चिकित्सा सेवाएं शामिल होती हैं जो रोगी के स्वास्थ्य को समझने के लिए आवश्यक हैं। निदान गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल के लिए जरूरी हैं। कमीशन के अनुसार अब यह धारणा कम प्रचलित हो गई है, जिसके चलते संसाधन कम हुए हैं।