यानी जो फायदे अफगानिस्तान को पहुंचे, उसकी वजह अंतरराष्ट्रीय सहायता थी। अफगानिस्तान की अंदरूनी अर्थव्यवस्था को इस दौरान कोई गति नहीं मिली। अब आशंका है कि तालिबान के शासनकाल में अंतरराष्ट्रीय सहायता शून्य रह जाएगी। इससे अफगानिस्तान में आर्थिक बदहाली और गंभीर रूप ले लेगी। गैरेथ ने चेतावनी दी है- ‘तालिबान की वापसी के साथ अफगानिस्तान फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पराया हो जाएगा। इसलिए वहां जीडीपी में भारी गिरावट और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की वापसी लगभग निश्चित है।’
थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज से जुड़े विशेषज्ञ एंथनी एच कॉर्ड्समैन ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती से अफगानिस्तान की आधुनिक अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र में पैदा होने वाली नौकरियों का गतिरुद्ध हो जाना तय है। विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि अफगानिस्तान से होने वाला निर्यात अब भी बहुत कम है। 2020 में वहां से एक अरब डॉलर के बराबर वस्तुओं का निर्यात हुआ था। यह ताजिकिस्तान से हुए निर्यात से कम था, जबकि अफगानिस्तान की आबादी ताजिकिस्तान से चार गुना ज्यादा है।
अफगानिस्तान से ज्यादार अंगूर, दूसरे ताजा फल, और ड्राइ फ्रूट का निर्यात होता है। अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका घटती चली गई है। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि आर्थिक बदहाली बढ़ने पर तालिबान फिर से नशीले पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा दे सकता है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में अफीम की खेती बड़े पैमाने पर होती है। तालिबान ने अपने पिछले शासनकाल में अफीम की तस्करी को आमदनी का प्रमुख जरिया बना लिया था।