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अफगानिस्तान सेंट्रल बैंक के पूर्व गवर्नर का दावा: बीस साल अंतरराष्ट्रीय मदद से ही चल रही थी देश की अर्थव्यवस्था

Mon, 23 Aug 2021 03:37 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

अफगानिस्तान के सेंट्रल बैंक के पूर्व गवर्नर अजमल अहमदी ने दावा किया है कि बीते दो दशकों में अफगानिस्तान में आम लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार हुआ। उनके मुताबिक इस दौरान देश में स्वास्थ्य और शिक्षा का ढांचा मजबूत हुआ, जिसकी वजह से लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ी...
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अफगानी बच्चे - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
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अफगानिस्तान के सेंट्रल बैंक के पूर्व गवर्नर अजमल अहमदी ने दावा किया है कि बीते दो दशकों में अफगानिस्तान में आम लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार हुआ। उनके मुताबिक इस दौरान देश में स्वास्थ्य और शिक्षा का ढांचा मजबूत हुआ, जिसकी वजह से लोगों की जीवन प्रत्याशा (जन्म के समय अपेक्षित जीवन काल) बढ़ी। साथ ही बाल मृत्यु दर में गिरावट आई। हालांकि अहमदी ने स्वीकार किया कि देश में फैले भ्रष्टाचार के कारण बाद में प्रगति की रफ्तार धीमी पड़ गई।

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अजमल अहमदी उन लोगों में हैं, जो 15 अगस्त को तालिबान के काबुल पहुंचने के बाद राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ देश छोड़ कर भाग गए। रविवार को ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि बीते 20 साल में अफगानिस्तान में जो प्रगति हुई, उसे कम करके बताने का मतलब उस बदलाव से इनकार करना होगा, जो सचमुच वहां हुआ।

लेकिन ब्रिटेन के थिंक टैंक चैटहैम हाउस में सीनियर रिसर्च फेलॉ डॉ. गैरेथ प्राइस ने कहा है कि अमेरिकी सेना की मौजूदगी वाले 20 साल में अफगानिस्तान में सामाजिक बदलाव जरूर आए, लेकिन आर्थिक संकेतकों में ज्यादा बदलाव नहीं आया। उन्होंने कहा कि खनिज पदार्थों का दोहन आर्थिक वृद्धि का एक संकेतक है। लेकिन इसमें कोई खास प्रगति नहीं हुई। इसके अलावा अवैध खनन भी जारी रहा।
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प्राइस ने कहा कि साल 2010 तक अफगानिस्तान में आर्थिक वृद्धि दर दो अंकों में रही। इससे जीवन स्तर में सुधार आया। लेकिन उसके बाद वृद्धि दर में ठहराव आ गया। उसकी वजह यह थी कि उसके बाद अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहायता में गिरावट आ गई। उन्होंने विश्व बैंक के आंकड़ों पर इस ओर ध्यान खींचा कि 2009 तक अफगानिस्तान के जीडीपी में अंतरराष्ट्रीय सहायता का योगदान 100 फीसदी था। जबकि 2020 में ये गिर कर 42.9 फीसदी रह गया।

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यानी जो फायदे अफगानिस्तान को पहुंचे, उसकी वजह अंतरराष्ट्रीय सहायता थी। अफगानिस्तान की अंदरूनी अर्थव्यवस्था को इस दौरान कोई गति नहीं मिली। अब आशंका है कि तालिबान के शासनकाल में अंतरराष्ट्रीय सहायता शून्य रह जाएगी। इससे अफगानिस्तान में आर्थिक बदहाली और गंभीर रूप ले लेगी। गैरेथ ने चेतावनी दी है- ‘तालिबान की वापसी के साथ अफगानिस्तान फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पराया हो जाएगा। इसलिए वहां जीडीपी में भारी गिरावट और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की वापसी लगभग निश्चित है।’

थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज से जुड़े विशेषज्ञ एंथनी एच कॉर्ड्समैन ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती से अफगानिस्तान की आधुनिक अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र में पैदा होने वाली नौकरियों का गतिरुद्ध हो जाना तय है। विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि अफगानिस्तान से होने वाला निर्यात अब भी बहुत कम है। 2020 में वहां से एक अरब डॉलर के बराबर वस्तुओं का निर्यात हुआ था। यह ताजिकिस्तान से हुए निर्यात से कम था, जबकि अफगानिस्तान की आबादी ताजिकिस्तान से चार गुना ज्यादा है।

अफगानिस्तान से ज्यादार अंगूर, दूसरे ताजा फल, और ड्राइ फ्रूट का निर्यात होता है। अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका घटती चली गई है। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि आर्थिक बदहाली बढ़ने पर तालिबान फिर से नशीले पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा दे सकता है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में अफीम की खेती बड़े पैमाने पर होती है। तालिबान ने अपने पिछले शासनकाल में अफीम की तस्करी को आमदनी का प्रमुख जरिया बना लिया था।
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