टोक्यो मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी और मुसाशिनो यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर नाओफुमी मासुमोतो ने टोक्यो के अखबार जापान टाइम्स से कहा- ‘आमतौर पर जापान के लोग ओलंपिक खेलों के प्रशंसक माने जाते हैं। लेकिन टोक्यो ओलंपिक अपवाद रहा, जिसे जापान के ज्यादातर लोगों ने नापसंद किया है। इसके पीछे एक बड़ा कारण खर्च का भी रहा है।’ मासुमोतो ने बताया कि ओलंपिक खेलों के आयोजन के लिए जो अनुबंध हुआ था, उसमें ही ये बात सामने आई थी कि आयोजन पर जो घाटा होगा, उसे मेजबान शहर उठाएगा। इसका मतलब है कि अतिरिक्त खर्च का बोझ टोक्योवासियों को उठाना पड़ेगा।
इसके बावजूद जापान में केंद्र सरकार और टोक्यो प्रशासन के बीच खर्च को लेकर टकराव शुरू हो गया है। टोक्यो के गवर्नर युरिको कोइके ने कहा है कि खर्च के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति, केंद्र सरकार, स्थानीय सरकार और आयोजन समिति के बीच फिर से बातचीत होनी चाहिए। जापान में बहुत से लोगों राय यही है कि टोक्यो शहर पर पूरा बोझ डाल देना सही नहीं होगा।
उत्सुनोमिया यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन के प्रोफेसर युजी नाकामुरा ने जापान टाइम्स से कहा- ‘कोरोना वायरस को लेकर आपातकाल की घोषणा केंद्र सरकार ने की थी। इसलिए अतिरिक्त खर्च को पूरी तरह टोक्यो पर थोप देना उचित नहीं होगा।’ टोक्यो के स्थानीय प्रशासन ने कहा है कि उसके खजाने की सेहत महामारी ने बिगाड़ दी है। ऐसे में उचित होगा कि प्रसारण अधिकारों से होने वाली आमदनी पर निर्भर अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को भी अतिरिक्त खर्च का बोझ उठाना चाहिए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर उसने ऐसा नहीं किया, तो भविष्य में दुनियाभर में शहर मेजबानी की पेशकश करने में हिचक सकते हैं।