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ली कुआन भारत के लिए आदर्श क्यों नहीं ?

Sun, 29 Mar 2015 02:35 PM IST
आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार / बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
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कुछ दिन पहले दिवंगत हुए सिंगापुर के नेता ली कुआन यू की तारीफ करते हुए अमेरीकी राजनयिक हेनरी किसिंजर ने उनकी आर्थिक कामयाबी की ओर इशारा किया था।
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उन्होंने कहा था, “ली और उनके सहयोगियों ने अपने देश की सालाना आर्थिक आमदनी 1965 में 500 डॉलर से बढ़ा कर आज तकरीबन 55 हजार डॉलर कर दी है। एक ही पीढ़ी में सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र और दक्षिण पूर्व एशिया का प्रमुख बौद्धिक महानगर बन गया।

यह क्षेत्र के प्रमुख अस्पतालों का केंद्र और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर होने वाले सम्मेलनों की पसंदीदा जगह बन गया।” यह अविश्वसनीय कामयाबी है और दुनिया के चुनिंदा देश ही इस तरह की जबरदस्त विकास दर हासिल कर पाए हैं।
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सिंगापुर को बनाया अंतरराष्ट्रीय शहर

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिंगापुर में कुछ खूबियां हैं। यह सौ साल से ज्यादा समय तक ब्रितानी शासन के तहत रहा। आजादी के समय यहां एक विकसित बंदरगाह थी और यह व्यापारिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था।

दूसरी ओर, 1965 में भारत की प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी सौ डॉलर थी और यहां के समाज में आर्थिक विषमता कहीं ज्यादा थी। सिंगापुर को यह सहूलियत भी थी कि यह बहुत कम जनसंख्या वाला एक छोटा देश था। इस देश की दो तिहाई आबादी चीन से आकर बसे लोगों की थी। वे लोग कनफ्यूशियस की संस्कृति के थे, जहां एकाधिकारवादी शासन के प्रति झुकने की प्रवृत्ति रही है। ली ने अनुशासित और ईमानदार प्रशासन के बल पर इन खूबियों का भरपूर फायदा उठाया और सिंगापुर को सही मायनों में अंतरराष्ट्रीय शहर बना दिया।

सिंगापुर जाने वाला कोई भी आदमी इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह सकता। जापान से लेकर यूरोप तक के किसी शहर से ज्यादा साफ सुथरा, समृद्ध और ठीक ढंग से चलने वाला शहर सिंगापुर है। इस पर कोई संदेह नहीं कर सकता।

दूरदृष्टि वाले नेता

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ली कुआन यू की मौत के बाद ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “यू दूरदृष्टि वाले राजनेता थे और उनके जीवन से हर किसी को अमोल शिक्षा मिलती है।”मोदी जैसे मज़बूत नेता ली को पसंद इसलिए करते हैं कि उनकी सत्ता लगभग निरंकुश थी। इसके क्या फायदे हैं?

'स्ट्रेट टाइम्स' के एक पाठक ली केक चिन ने 2012 मे अखबार में एक चिट्ठी लिखी। उनका खत अखबार में छपी ख़बर “दो पार्टियों की प्रणाली यहां कारगर नहीं हो सकती” के जवाब में था। उन्होंने लिखा था, “प्रधानमंत्री ली सीन लूंग को लगता है कि दो अच्छे राजनीतिक दलों के लायक प्रतिभा इस देश में नहीं है। हमें भारत जैसे बहुलतावादी देश की तुलना एकदलीय शासन वाले देश चीन से करनी चाहिए। दोनों देशों की आबादी बहुत ज्यादा है और संस्कृति भी लगभग एकरूपी है। हालांकि दोनों ही देशों में अच्छा आर्थिक विकास हो रहा है, पर चीन बेहतर कर रहा है।"

कई बार ऐसा देखा गया है कि जिन देशों में एक दल दूसरे दल से आगे निकलने की कोशिश में रहते हैं, वहां आर्थिक विकास रुक जाता है। अमेरिका में ऐसा ही हुआ है। ली की कौन सी शिक्षाएं भारत जैसे देशों में लागू की जा सकती हैं?प्राकृतिक संसाधन नहीं होने के बावजूद हॉंगकॉंग, ताइवान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों में आर्थिक विकास काफी हुआ है। पर सिंगापुर इन सबसे अलग इस मायने में है कि यह हाल फ‌िलहाल के वित्तीय संकट से अछूता रहा है।

एक दलीय सरकार

इस पाठक ने लिखा, "मेरा मानना है कि इसकी वजह यह है कि हमारी एक दलीय सरकार देश को एक दिशा में ले गई है। दो दलीय या बहुदलीय प्रणाली वाले बड़े देश गिर कर संभल सकते हैं। सिंगापुर जैसे छोटे देशों को दूसरी बार मौका नहीं मिलता है”।

ली की सफलता का यह पारंपरिक तर्क है, सिंगापुर में उनकी तानाशाही चलती थी। इस तथ्य को नहीं माना जाता है कि लोगों में प्रतिभा थी और छोटा देश ज़ोर जबरदस्ती के अनुकूल था।यह विवाद से परे है कि ऊंचे विकास दर के लिए सरकार की पकड़ मज़बूत होना जरूरी है।

सरकार की पकड़ मजबूत होने से लोगों को दबाया जा सकता है, नागिरकों से टैक्स आसानी से वसूला जा सकता है, लोगों के साथ न्याय होता है और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा सकती हैं। पर इस तरह की व्यवस्था की दिक्क़त यह है कि इन उपायों को भारत जैसे बड़े और कम संसाधन वाले देशों में लागू नहीं किया जा सकता है।
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इज्जत को धक्का

सिर्फ मजबूत नेता से ही स्थितियां नहीं बदल जाती हैं। ली ने जब ताज्जुब जताया था कि भारत में क्यों इस तरह की कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती, उन्होंने इस बात की ठीक से नहीं समझा था।

इन जगहों पर होने वाले नुक़सानों की भी अनदेखी कर दी जाती है। सिंगापुर से ऑस्ट्रेलिया जा बसने वाले पीटर ओंग सिंगापुर के नागरिकों के साथ की जाने वाली ज्यादातियों को नापसंद करते हैं।च्यूइंग गम चबाने पर रोक लगाने और बेंत लगाने जैसे ली के मनमाने और अजीब क़ानूनों से देश की इज्जत को धक्का ही लगा है जबकि मूल्यों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई।

मैं एक बार फिर कहना चाहता हूं कि 1965 से 2015 के बीच सिंगापुर की औसत आमदनी भारत के औसत आय से पांच गुना ज़्यादा होना निश्चित तौर पर बड़ी सफलता है। पर इस आधार पर सिंगापुर को आदर्श मान लेना ग़लत होगा। यह मानना भी गलत होगा कि ली या उन जैसा कोई दूसरा मसीहा भारत में भी वही कर दिखाता जो उसने सिंगापुर में किया।

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