फ्रांस में यूरोप की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। फ्रांस पूरी तरह सेक्यूलर मूल्यों वाला देश है। सामाजिक, राजनीतिक माहौल में उदारता है और धर्मनिरपेक्षता इस देश की खास धरोहर है। धर्म और राज्य के बीच कोई घालमेल बर्दाश्त नहीं किया जाता है। धार्मिक कट्टरता किसी भी हालत में मंजूर नहीं है।
फ्रांस में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ कड़ा रुख कट्टरपंथियों को नाराज करता है। धर्म को कोई खास बढ़ावा न दिए जाने से कट्टरपंथियों का काम मुश्किल हो जाता है। धर्म को प्रोपगेंडा बनाने के खिलाफ फ्रांस की इस दृढ़ता से रेडिकल तत्व नाराज हैं। यही वजह है कि वे इस तरह का हमला कर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। फ्रांस में ट्रक के जरिये हुए इस हमले को अपनी तरह का पहला हमला बताया जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है। फ्रांस में दो बार ट्रक के जरिये इस तरह के हमले हो चुके हैं।
फिलिस्तीनियों ने इस तरह के हमले इजरायलियों के खिलाफ किए हैं। लेकिन फ्रांस में यह जो हमला हुआ है, वह पूरी तरह इंटेलिेजेंस एजेंसियों की नाकामी का नतीजा है। नवंबर, 2015 के हमले के बाद फ्रांस में आतंरिक सुरक्षा को लेकर एक हाई लेवल कमेटी बनी थी। लेकिन उससे भी स्थिति सुधरती नजर नहीं आती। दरअसल फ्रांस में छह इंटेलिजेंस एजेंसियां हैं। एक्सटर्नल एजेंसी, इंटरनल एजेंसी, डाटा एजेंसी इस तरह की छह एजेंसियां हैं और ये तीन मंत्रालयों को रिपोर्ट करती हैं।
कुल मिलाकर यह हमला फ्रांस में इंटेलिजेंस एजेंसियों की कार्यप्रणाली और उसकी नाकामी को दिखाता है। फ्रांस के प्रोमेनेड डैस एगेंलेस इलाके में जिस तरह का यह भयावह हमला हुआ उससे एक भारी चिंता पैदा हुई है। एक गुस्सैल या अंदर ही अंदर नाराज और चिड़चिड़े व्यक्ति ने जिस तरह का यह हमला किया उससे एक तस्वीर साफ तौर पर उभरती है।
वह यह है कि व्यक्तिगत तौर पर असफल लोग कट्टरपंथी तत्वों के जाल में फंसते जा रहे हैं और अपना गुस्सा इस तरह के हमले कर उतार रहे हैं। 2012 में इसी तरह के मोहम्मद मेरा नाम के शख्स ने भारतीय दूतावास पर हमला किया था। ये छोटे-मोटे अपराधी होते हैं और इन्हें जेल में रहने के दौरान कट्टरपंथी सीख दी जाती है या फिर इन्हें इटंरनेट के जरिये कट्टरता का पाठ पढ़ाया जाता है।