ओमिक्रॉन ने कोरोना के म्यूटेशन, टीकाकरण और नए वायरस स्वरूपों के खिलाफ प्रतिरक्षा को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है, बी.1.1.529 विकासशील देशों में कम टीकाकरण का नतीजा है। दक्षिण अफ्रीका में तेज प्रसार ने इस ओर इशारा किया है। कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है, मौजूदा टीकों को ओमिक्रॉन के खिलाफ निष्प्रभावी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसके कुछ बदलाव पुराने ही हैं। टीकों में सुधार कर इसके खिलाफ सक्षम बनाया जा सकता है।
राहत : कुछ बदलाव पुराने बिलकुल बेअसर नहीं टीके
पहले सीमित था ज्यादा म्यूटेशन वाला स्वरूप
वायरस के स्पाइक प्रोटीन में 30 से भी ज्यादा बदलाव के बाद ओमिक्रॉन के रूप में मजबूत स्वरूप सामने आया है, जो प्रतिरक्षा से बचने में कामयाब हो सकता है। ऐसे में ओमिक्रॉन के तेज प्रसार और टीके का प्रभाव घटाने का खतरा बढ़ा है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं, द.अफ्रीका समेत गरीब देशों में टीकों की कम आपूर्ति और कमजोर टीकाकरण के चलते इस स्वरूप का जन्म हुआ है। हालांकि, राहत की बात यह है कि अब तक इतने ज्यादा म्यूटेशन वाला स्वरूप ज्यादा प्रसारित नहीं हुआ है।
हाइब्रिड प्रतिरक्षा से बचाव
बीटा और डेल्टा का मिश्रण
ओमिक्रॉन के म्यूटेशन देख वैज्ञानिकों ने मोटे तौर पर साफ कर दिया कि मौजूदा टीके कम प्रभावी रहेंगे। द. अफ्रीका में संक्रामक रोग संस्थान में वायरसविद पेनी मूर के मुताबिक, ओमिक्रॉन में बीटा स्वरूप की टीकों से बचने और डेल्टा के तेज प्रसार की क्षमता समाहित है।
स्पाइक प्रोटीन में डेल्टा से ढाई बीटा से चार गुना म्यूटेशन
इसके स्पाइक प्रोटीन में 26 विशेष म्यूटेशन मिले हैं, जबकि डेल्टा में यह संख्या 10 व बीटा में छह ही थी। इसलिए कुछ शोधकर्ता जोर दे रहे हैं कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र इस स्वरूप को पहचानकर रोकने में ज्यादा सफल नहीं हो पाएगा।
ओमिक्रॉन के खिलाफ फौरन प्रयोगशालाओं में जुटें वैज्ञानिक
विकासवादी जीवविज्ञानी डॉ जेसी ब्लूम का कहना है, पहले के मुकाबले ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। संभवतः कुछ हफ्तों में ज्यादा पुख्ता तौर पर बता पाएंगे कि ओमिक्रॉन किस तरह फैल रहा है? अलग से टीके कितने जरूरी हैं? डरबन में वैज्ञानिक बचाव के लिए फौरन जुट गए हैं। शोधकर्ताओं ने 100 से ज्यादा सैंपल लेकर अध्ययन शुरू कर दिया। टीकों का असर जानने की कवायद भी शुरू हो गई, जिसके दो सप्ताह में नतीजे मिलेंगे।