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दागदार है कोरोना वैक्सीन बनाने वाली चीनी कंपनी साइनोवाक का इतिहास, लग चुके हैं भ्रष्टाचार के आरोप

Mon, 07 Dec 2020 04:29 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

  • सार्स और स्वाइन फ्लू का भी टीका तैयार कर चुकी है कंपनी
  • टीके को मंजूरी दिलाने के लिए कंपनी पर लगे थे रिश्वत देने के आरोप
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कोरोना वायरस वैक्सीन - फोटो : iStock
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विस्तार
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कोरोना वायरस संक्रमण के रोकथाम की वैक्सीन तैयार करने वाली चीन की कंपनी साइनोवाक बायोटेक आज दुनिया भर में चर्चित है, लेकिन इसका इतिहास दागदार रहा है। अतीत में उस पर अपने उत्पादों को बाजार दिलाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेने के आरोप लगे हैं।

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इस कंपनी ने 2003 में सार्स की वैक्सीन तैयार की थी। फिर 2009 में उसने स्वाइन फ्लू का टीका तैयार किया। उन दोनों मौकों पर कंपनी के सीईओ पर इल्जाम लगे थे कि उन्होंने अपने टीके को मंजूरी दिलाने के लिए ड्रग रेगुलेटर को रिश्वत दी। ऑस्ट्रेलियाई अखबार ‘द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ में छपी एक रिपोर्ट में ये जानकारी दी गई है।


साइनोवाक अभी ब्राजील से लेकर टर्की और इंडोनेशिया तक में कोरोना वायरस के अपने वैक्सीन की सप्लाई करने की तैयारी में है। साइनोवाक उन दो चीनी कंपनियों में एक है, जो कोरोना वायरस का टीका तैयार करने में सबसे आगे चल रही हैं। साइनोवाक के टीके का अंतिम चरण का परीक्षण चल रहा है। चीन के अंदर साइनोफार्म कंपनी का टीका आपातकालीन स्थितियों में लगाया भी जा रहा है।
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इसी तरह कैनसाइनो नामक कंपनी के टीके को इमरजेंसी मामलों में मरीजों को लगाने की इजाजत दी जा चुकी है। कैनसाइनो ने अपना टीका एक सैनिक अनुसंधान संस्थान के साथ मिल कर तैयार किया है।

साइनोवाक की वैक्सीन कोरोनावाक को कई विकासशील देशों का बाजार मिलने की संभावना है। ब्राजील और इंडोनेशिया में इसे अगले हफ्ते ही मंजूरी मिल जाने की उम्मीद है। ब्राजील में साओ पाउलो राज्य के गवर्नर हुआओ दोरिया ने इसे अब तक बने सभी टीकों के बीच सबसे ज्यादा सुरक्षित बताया है। लेकिन साइनोवाक ने अभी अपना डाटा जारी नहीं किया है। इससे यह पता नहीं चल रहा है कि क्या उसका टीका अमेरिकी कंपनियों मोडेरना और फाइजर के टीकों जितना ही प्रभावी होगा। चूंकि कंपनी का अतीत दागदार है, इसलिए इस बारे में कई हलकों से सवाल उठाए गए हैं।

साइनोवाक के तत्कालीन सीईओ ने मंजूर किया था कि उन्होंने रेगुलेटरी अधिकारियों को रिश्वत दी। उन्होंने कहा था कि जब उनसे पैसे की मांग की गई, तो वे उसका विरोध नहीं कर पाए। लेकिन बाद इस बात के कोई प्रमाण सामने नहीं आए कि घूस देकर जिन वैक्सीन को मंजूरी दिलवाई गई, उनमें कोई कमी थी या वे किसी लिहाज से असुरक्षित थी।

लेकिन कुछ मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बावजूद साइनोवाक के कोरोना वैक्सीन की अतिरिक्त जांच उचित होगी, क्योंकि कंपनी ने नैतिक रूप से समझौता किया था। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के लैंगस्टोन मेडिकल सेंटर के चिकित्सा नैतिकता विभाग के निदेशक आर्थर कापलान ने द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड से कहा- चूंकि इस कंपनी का इतिहास घूसखोरी में शामिल रहने का है, इसलिए उसके वैक्सीन पर संदेह का साया पड़ा हुआ है। खासकर इसलिए भी कि उसने डाटा जारी नहीं किया है।

अमेरिकी अखबार ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में छपी एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि साइनोवाक सरकारी अधिकारियों को रिश्वत खिलाकर ही चीन की एक प्रमुख कंपनी के रूप में उभरी। अखबार के मुताबिक इस बारे में ज्यादा जानकारी इसलिए उपलब्ध नहीं है, क्योंकि चीन में मीडिया पर सेंसरशिप है।

साइनोवाक कंपनी 2001 में बनी थी। उसके दो साल बाद ही जब चीनी अधिकारियों ने उसे सार्स और कुछ सालों के अंदर अवियन फ्लू और स्वाइन फ्लू के टीके बनाने के लिए चुना, तो उन फैसलों पर शक उठा था। 2008 से 2016 के बीच अलग-अलग मामलों में कम से कम 20 सरकारी अधिकारियों और अस्पताल प्रशासकों ने अदालत में साइनोवाक के कर्मचारियों से घूस लेने की बात स्वीकार की थी।

‘द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ के मुताबिक घूसखोरी के आरोप लगने के बाद 2017 में साइनोवाक ने अंदरूनी जांच कराई। उसके नतीजों का एलान आज तक नहीं किया गया है। लेकिन इस साल अप्रैल में जारी अपनी सालाना रिपोर्ट में कंपनी ने कहा कि वह भ्रष्टाचार विरोधी सख्त नीतियों का पालन कर रही है, हालांकि ये मुमकिन है कि ये उपाय पूरी तरह प्रभावी ना हों।

चीन के दवा उद्योग में भ्रष्टाचार की लंबी कहानी रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक चीन ने साल 2000 में दवा मंजूरी की केंद्रीकृत प्रणाली अपनाई, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला। शिकागो यूनिवर्सिटी के राजनीति-शास्त्री डाली यांग के मुताबिक भ्रष्टाचार एक समय जितना व्याप्त था, आज वैसी हालत नहीं है। ऐसा इस तरह के मामलों में सरकार की कड़ी कार्रवाई के कारण हुआ है।

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2012 में भ्रष्टाचार के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़ा था। फिर भी जानकारों की राय है कि जहां तक दवा और वैक्सीन का सवाल है, दुनिया को चीनी कंपनियों के उत्पादों के मामले में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

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