बिल्कुल! वायरस जब भी अपना रूप बदलेगा, उसके जीनोम सीक्वेंस से वैज्ञानिक जान सकेंगे। किसी खास जगह मिला वायरस वहां कैसे और किस व्यक्ति के जरिये आया, उसने अपना रूप कितने समय में और किस व्यक्ति में बदला, यह कुछ ऐसी जानकारियां हैं, जिनके मिलने से वायरस के प्रसार की मात्रा और समय का सही आकलन हो सकता है।
वायरस भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार भी स्वयं को बदलता है, ऐसे में उसके किसी खास स्वरूप के मूल ठिकानों को पता लगाया जा सकता है। जैसे भारत में वायरस चीन से आया या यूरोप से, देश में वह किन जगहों पर पनपा, किन दूसरे क्षेत्रों में, किसके जरिये और कब फैला आदि बातों का पता लगाया जा सकता है।
लोगों के इलाज में इससे क्या मदद मिलेगी?
जीनोम सीक्वेंस मालूम होने पर एक अनुमान मिल सकता है कि कितने लोगों में, किस खास क्षेत्र में यह वायरस फैला है। केवल पॉजिटिव टेस्ट से मिली मरीजों की संख्या ही नहीं, बल्कि इस अनुमान से आंकी गई संख्या के अनुसार इलाज के लिए पहले से तैयारियां की जा सकती हैं।
सभी देश अब डाटा को एक दूसरे से साझा कर रहे हैं। अब तक इस प्रकार के अध्ययनों में जिन देशों से डाटा नहीं मिलता था और उन्हें ‘डाटा डार्क स्पॉट’ कहा जाता था, वहां से भी सूचनाएं मिल रहींं। अब एक लैपटॉप और मोबाइल फोन के आकार के डीएनए सीक्वेंसर से यह डाटा मुहैया करवाया जा सकता है, बड़ी प्रयोगशालाओं की जरूरत नहीं रही।
मरीजों की नाक से मिले स्वाब के सैंपल से डीएनए सीक्वेंसर से आनुवांशिक तत्व अलग किए जाते हैं। जितने अलग-अलग स्थानों से सैंपल जुटाए जाते हैं, जीनोम सीक्वेंसिंग उतनी ही विस्तृत होती है। इस डाटा को डाटाबेस में अपलोड किया जाता है, जिससे वायरस के नए स्वरूपों के बारे में पूरा विश्व जान पाता है।