पाक अधिकृत कश्मीर पर आज हम आपके सामने पेश कर रहे हैं इस सीरीज की तीसरी व अंतिम कड़ी। इसमें बताएंगे कि किस धूर्तता के साथ पाकिस्तान ने पीओके में गैर कश्मीरियों यानी पाकिस्तानियों को बसाने के लिए चाल चली। इसके लिए कानून को तोड़ा मरोड़ा गया।
भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाकर लद्दाख को उससे अलग किया और उधर पाकिस्तान हायतौबा मचाने लगा। वो कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की पुरजोर कोशिश कर चुका है और अब भी कर रहा है। यह सब वो तब कर रहा है जब उसने खुद कश्मीर के काफी बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है। पिछले 70 साल से पाकिस्तान अपनी इस हरकत को सही साबित करने की असफल कोशिश भी कर रहा है।
आधे कश्मीर पर अवैध कब्जा करने के बाद पाकिस्तान ने इसे दो हिस्सों में बांट दिया था। एक हिस्से को तथाकथित रूप से आजाद कश्मीर नाम दिया और दूसरे हिस्से को संघ प्रशासित उत्तरी क्षेत्र (फेडरल एडमिनिस्टर्ड नॉर्दर्न एरिया) कहा गया।
1969 में पाकिस्तान ने एक सलाहकार परिषद का गठन किया, जो इस संघ प्रशासित उत्तरी क्षेत्र का प्रशासन चलाने में मदद करती थी। इसके बाद 1994 में इस परिषद को उत्तरी क्षेत्र परिषद नाम दे दिया गया, जिससे इसे कानूनी रूप से वैध साबित किया जा सके। इसके पांच वर्ष बाद उत्तरी क्षेत्र का एक बार फिर नाम बदला गया और अब इसे उत्तरी क्षेत्र विधान परिषद कहा जाने लगा।
इस बदलाव के साथ ही गिलगित बाल्टिस्तान परिषद को विधान सभा की माना जाने लगा। इस विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को यह अधिकार दिया गया कि वो राज्य विषय के 63 मामलों को कानून बनाकर खत्म कर सकते हैं। साथ ही वो गिलगित बाल्टिस्तान की विधानसभा या असेंबली के आदेशों को भी निरस्त कर सकते हैं। 2018 में इस असेंबली ने अपने आदेश में एक और संशोधन किया और पाकिस्तानी राष्ट्रपति को भी शक्तियां प्रदान कीं।
आजादी के पहले 1927 में जम्मू-कश्मीर रियासत ने स्टेट सब्जेक्ट रूल (राज्य विषय नियम) नाम का एक कानून बनाया था, जिसके तहत रियासत के सीमाक्षेत्र में कोई भी बाहरी व्यक्ति या संस्था जमीन नहीं खरीद सकती थी। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने गिलगित बाल्टिस्तान में इस नियम को खत्म कर दिया। इससे इस क्षेत्र में गैर कश्मीरियों यानी पाकिस्तानियों को बसाने का रास्ता साफ हो गया।
पाकिस्तान लगातार यह कह रहा है कि जम्मू-कश्मीर को दिया गया विशेष राज्य का दर्जा हटाकर भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अपमान किया है। लेकिन यह पूरी तरह झूठ है। क्योंकि भारत ने नहीं, बल्कि पाकिस्तान ने अवैध कब्जे वाले हिस्से को हर तरह से अपना बनाने की तिकड़म की है। स्टेट सब्जेक्ट रूल को खत्म करना इसी की बानगी है।
कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में शिया और इस्मायली आबादी ज्यादा थी। लेकिन 1998 से 2011 के बीच पाकिस्तान ने यहां सुन्नी आबादी बसाई। इस तरह से वो इस क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान से छेड़छाड़ करता रहा। पाकिस्तान के फौजी शासक जनरल जिया उल हक और उनके बाद के शासकों ने इस क्षेत्र में स्टेट सब्जेक्ट रूल को लगातार कमजोर ही किया।
पाकिस्तान का दावा है कि 28 अप्रैल 1949 को पाक सरकार के एक मंत्री और तथाकथित आजाद कश्मीर के राष्ट्रपति के बीच एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें आजाद कश्मीर के राष्ट्रपति ने गिलगित बाल्टिस्तान का प्रशासनिक नियंत्रण पाकिस्तान सरकार को हस्तांतरित कर दिया था। लेकिन जिस तथाकथित राष्ट्रपति इब्राहिम का नाम इन कागजातों पर दर्ज है वो सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी भी अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर चुका है।