फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप को अपने फायदे में पुनर्जीवित करने में जुटा चीन

Mon, 23 Nov 2020 05:41 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कुआलालम्पुर

सार

  • चीन की बढ़ती ताकत रोकने के लिए ओबामा ने की थी टीपीपी की परिकल्पना
  • ट्रंप ने 2016 में पलट दिया था ओबामा का फैसला, अमेरिका को कर दिया था टीपीपी से अलग
विज्ञापन
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कॉम्प्रिहेंसिव एवं प्रोग्रेसिव ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) करार एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि हफ्ता भर पहले क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौता करने के बाद क्या अब चीन टीपीपी में भी शामिल हो जाएगा? पिछले शुक्रवार को एपेक (एशिया-पैसिफिक आर्थिक सहयोग) की बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि चीन टीपीपी समझौते में शामिल होने पर सकारात्मक रूप से विचार करेगा। ये विडंबना ही है कि बराक ओबामा ने अमेरिका का राष्ट्रपति रहते हुए जिस करार की कल्पना चीन की बढ़ती ताकत पर विराम लगाने के लिए की थी, अब उसी चीन की पहल से इस समझौते की संभावनाओं पर दुनिया भर में चर्चा शुरू हो गई है।

विज्ञापन


अमेरिका में मुक्त व्यापार समझौते अब काफी अलोकप्रिय हो गए हैं। 2016 में डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे तमाम समझौतों से अमेरिका को अलग करने का वादा करते हुए राष्ट्रपति चुनाव जीता था। इसके बाद उन्होंने टीपीपी से अमेरिका को अलग कर लिया था। देश के जनमत को देखते हुए इस साल के चुनाव में विजयी हुए डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन ने भी टीपीपी को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया है। उन्होंने सिर्फ यह कहा है कि अगर इस करार की शर्तों में सुधार हुआ, तो वे टीपीपी में अमेरिका को दोबारा शामिल करने पर विचार करेंगे।

ऐसे में इस समझौते की संभावनाओं को मृत समझ लिया गया था। लेकिन जिस तरह पिछले हफ्ते 15 देशों ने अमेरिका को छोड़कर आरसीईपी समझौता कर लिया, उससे टीपीपी भी चर्चा में आया। आरसीईपी करार होने के पांच दिन बाद हुए एपेक शिखर सम्मेलन में चीन ने इसमें शामिल होने की इच्छा जता दी।
विज्ञापन


वैसे चीन की ये पहल अचानक नहीं है। पिछले मई में चीन की संसद नेशनल पीपुल्स कांग्रेस में प्रधानमंत्री ली किछियांग ने कहा था कि टीपीपी में शामिल होने को लेकर चीन का नजरिया सकारात्मक और खुला है। उसके बाद चीन के वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता गाओ फेंग ने कहा था कि टीपीपी करार के नियम विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) के नियमों से मेल खाते हैं। यानी चीन ने डब्लूटीओ के नियमों को स्वीकार किया है, तो उसे टीपीपी के नियमों से ज्यादा गुरेज नहीं होगा।

जब ये करार हुआ था, तब टीपीपी का मकसद दुनिया का सबसे उन्नत व्यापार समझौता करना बताया गया था। तब कहा गया था कि इस करार के तहत डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा अधिकार संरक्षण, निवेश अधिकार, पर्यावरण एवं श्रम मानदंडों और सरकारी प्रतिष्ठानों में पारदर्शिता के कायदे शामिल किए जाएंगे। तब अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था कि चीन इस समझौते में तभी शामिल हो पाएगा, जब इन प्रतिमानों पर खरा उतरेगा। साथ ही उसे करार में शामिल होने वाले सभी सदस्य देशों का भरोसा जीतना होगा। इसी मकसद से टीपीपी के हर सदस्य देश को किसी नए देश को शामिल करने के मामले में वीटो का अधिकार देने का प्रावधान इसमें रखा गया था।

आरंभिक प्रस्ताव के मुताबिक टीपीपी में 11 देश थे। ये देश थे- ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कनाडा, चिले, जापान, मलेशिया, मेक्सिको, न्यूजीलैंड, पेरू, सिंगापुर और अमेरिका। बाद में वियतनाम भी इसमें आया। अब इनमें से ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, मलेशिया, न्यूजीलैंड, वियतनाम और सिंगापुर आरसीईपी में शामिल हो गए हैं।

टीपीपी के नियमों और आरसीईपी में एक बड़ा फर्क यह है कि आरसीईपी में पर्यावरण और श्रम मानदंडों के पालन का कोई प्रावधान नहीं है। यह चीन के माफिक है। कोरोना महामारी और लॉकडाउन के असर मारी विश्व व्यवस्था के बीच आरसीईपी में शामिल हुए देशों ने पर्यावरण और श्रम मानदंडों की फिक्र नहीं की।

इस बीच कोरोना संकट के कारण ही हाल में अमेरिकी मीडिया में भी चीन को टीपीपी में शामिल करने के पक्ष में आवाजें मजबूत हो गई हैँ। हाल में मीडिया संस्थान ब्लूमबर्ग ने चीन को शामिल करने के फायदों की पूरी फेहरिश्त पेश की। इसकी रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका के टीपीपी से निकल जाने के कारण एक बड़ा उपभोक्ता बाजार इस करार के दायरे से बाहर हो गया।

अब अगर चीन शामिल हो, तो इस करार के दायरे में दुनिया की 28 फीसदी जीडीपी आ जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया- कोविड-19 के बाद हम अपने जीवन की सबसे बुरी मंदी देख रहे हैं। मुक्त व्यापार से संकटग्रस्त विश्व अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद मिल सकती है। इसलिए अगर चीन को टीपीपी में शामिल करने का कभी कोई उचित समय होता, तो वो यही है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें