पर्यवेक्षकों ने कहा है कि चीन ने पश्चिमी देशों की तुलना में काफी पहले इस खतरे को समझ लिया। उसने अपने यहां डिजिटल कंपनियों की जांच-पड़ताल का एक सिस्टम बना लिया है। एक समय चीन के ऑनलाइन भुगतान के 94 फीसदी हिस्से पर अलीबाबा कंपनी के अली-पे और टेंसेंट कंपनी के वीचैट का कब्जा था। लेकिन अब ये बीते समय की बात हो गई है। वहां डिजिटल कंपनियों के लिए यह नियम लागू किया गया है- एक जैसे कारोबार में सबके लिए एक जैसे नियम।
पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (चीन के केंद्रीय बैंक) के गवर्नर यी गांग ने पिछले हफ्ते आयोजित कांफ्रेंस में कहा- चीन में अब बड़ी कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे एक फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी बनाएं और वित्तीय गतिविधियों में शामिल सभी सहयोगी कंपनियों को उसी के तहत ले आएं। इससे वित्तीय कारोबार को टेक्नलॉजी सेवाओं से अलग करने में मदद मिलेगी। साथ ही कंपनी के दूसरे कारोबार से भी वित्तीय कारोबार का सीधा संबंध नहीं रह जाएगा।
दूसरी तरफ जी-7 देशों में अभी टेक कंपनियों के लिए नए नियम लागू करने पर अभी विचार-विमर्श का दौर ही चल रहा है। पिछले हफ्ते जी-7 देशों के वित्त मंत्रियों और सेंट्रल बैंकों के गवर्नरों की बैठक वाशिंगटन में हुई। उसमें इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक विनियामक व्यवस्था तैयार नहीं हो जाती, किसी कंपनी को अपनी डिजिटल मुद्रा लॉन्च नहीं करना चाहिए।
इस बैठक में फ्रांस के सेंट्रल बैंक के गवर्नर फ्रांक्वां विलेरॉय दे गालहा ने कहा कि कई बड़ी टेक कंपनियों का वित्तीय कारोबार से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये कंपनियां अपने अकूत धन का दुरुपयोग करते हुए छोटी कंपनियों को नुकसान में ना डाल दें। इन चर्चाओं के बीच यी गांग ने कहा- ‘मुद्रा डिजिटलाइजेशन के बारे में अंतरराष्ट्रीय नियमों को तय करने की प्रक्रिया में भागीदारी के लिए हम तैयार हैँ।’