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जलवायु परिवर्तन और चीन: अमेरिका के लिए क्या मायने हैं इन दो चुनौतियों के?

Mon, 08 Nov 2021 04:44 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ग्लासगो

सार

अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जलवायु परिवर्तन से अमेरिका की सैनिक संपत्तियों के लिए खतरा पैदा हो रहा है। इससे 21वीं सदी में अमेरिका के लिए एक नया मोर्चा खुल गया है। ग्लासगो में अपने भाषण में बाइडेन ने जलवायु परिवर्तन को ‘अस्तित्व से जुड़ा खतरा’ बताया। उसके साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका चीन के रूप में ‘सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती’ का सामना कर रहा है...
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कॉप26 शिखर सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन का मुद्दा अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि जिस समय अमेरिका चीन की बढ़ती ताकत और रूस की तरफ से आ रही नई सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है, जलवायु परिवर्तन के मसले पर दुनिया को नेतृत्व दे सकने की उसकी क्षमता कठघरे में खड़ी हो गई है।

शी जिनपिंग की खुल कर आलोचना

अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने पिछले महीने एक रिपोर्ट जारी की थी। नेशनल इंटेलिजेंस एस्टीमेट नाम से आई ये रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के मसले पर अमेरिका में तैयार हुई पहली खुफिया रिपोर्ट है। विश्लेषकों का कहना है कि उस रिपोर्ट का असर यहां जलवायु परिवर्तन पर चल रहे संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (कॉप-26) के दौरान देखने को मिला है। पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सम्मेलन में न आने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खुल कर आलोचना की थी। इसे उसी रिपोर्ट के आधार पर बनी नीति का परिणाम समझा गया है।

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अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जलवायु परिवर्तन से अमेरिका की सैनिक संपत्तियों के लिए खतरा पैदा हो रहा है। इससे 21वीं सदी में अमेरिका के लिए एक नया मोर्चा खुल गया है। ग्लासगो में अपने भाषण में बाइडेन ने जलवायु परिवर्तन को ‘अस्तित्व से जुड़ा खतरा’ बताया। उसके साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका चीन के रूप में ‘सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती’ का सामना कर रहा है। विश्लेषकों ने कहा है कि अमेरिका की नई समझ में ये दोनों चुनौतियां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

अमेरिका को सहयोग नहीं करेगा चीन

खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि जलवायु परिवर्तन रोकने में कौन देश कितनी बड़ी भूमिका निभा रहा है, इस सवाल पर दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच टकराव खड़ा हो सकता है। चीन ने जलवायु परिवर्तन के मसले पर अमेरिका से सहयोग करने से फिलहाल इनकार कर रखा है। उसका कहना है कि अमेरिका जब तक मानव अधिकार के मुद्दों पर उसकी आलोचना बंद नहीं करता, वह ऐसा सहयोग नहीं करेगा। इसके अलावा चीन अब ‘जलवायु न्याय’ का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा रहा है। उसका कहना है कि पश्चिम के धनी देशों ने इतिहास में जलवायु को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इसलिए ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के लिए उन्हें ज्यादा योगदान करना होगा।

अमेरिकी एजेंसियों का आकलन है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया की भौतिक सूरत बदल रही है। आर्कटिक इलाके में बर्फ तेजी से पिघलने के कारण समुद्र में जहाज के नए रास्ते खुलेंगे। उधर और कच्चे तेल और खनिज पदार्थों के उपयोग का तरीका बदलेगा। इससे बड़ी ताकतों के बीच आर्थिक होड़ तेज होगी। पानी के खड़े हो रहे संकट का असर भी विभिन्न देशों के आपसी संबंधों पर पड़ेगा।

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अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का अंदाजा है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे खराब असर विकासशील देशों पर पड़ेगा। इसलिए ऐसे देशों की निवेश और मानवीय सहायता के लिए मजबूत देशों पर निर्भरता बढ़ जाएगी। चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिए इस मामले में अपने लिए अनुकूल स्थिति बना ली है।

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल में ऊर्जा एवं पर्यावरण मामलों के प्रभारी रहे जॉन कॉन्गर ने अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा कि अमेरिका को शतरंज की बदलती बिसात के मुताबिक चालें चलनी पड़ेंगी। अगर आप एक चाल चूक या जीत गए, तो उसका असर पूरी तस्वीर पर पड़ेगा।

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