सीडीपीएचआर की रिपोर्ट में पाकिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई है। पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ-साथ सिख और ईसाई अल्पसंख्यकों को भी चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं। पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों का रहना जंग लड़ने से कम नहीं है। वहां हिंदू, सिख और ईसाई धर्म की युवा महिलाओं के साथ अपहरण, दुष्कर्म और जबरन धर्म परिवर्तन आदि घटनाएं लगातार हो रही हैं। इसके अल्पसंख्यक को डराया और धमकाया भी जाता है।
बता दें कि पाकिस्तान की आबादी 21 करोड़ है। विभाजन के समय मजहबी जनसांख्यिकी प्रतिशत को आधार बनाएं, तो हिंदू-सिखों की आबादी 3.5 करोड़ होनी थी। जो 50-60 लाख रह गई है। ज्यादातर हिंदू-सिखों ने या तो उत्पीड़न से त्रस्त होकर इस्लाम अपना लिया या पलायन कर लिया। जिसने विरोध में आवाज उठाई, उसे मार दिया गया।
अफगानिस्तान: विलुप्त होने की कगार पर हिंदू
अफगानिस्तान में हिंदू अब लुप्त होने के कगार पर हैं।अफगानिस्तान के संविधान के अनुसार, कोई मुस्लिम व्यक्ति ही देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन सकता है। 1970 की जनसंख्या के अनुसार, वहां सात लाख के करीब हिंदू और सिख थे, जो अब सिर्फ 200 हिंदू और सिख परिवार रह गए हैं। तिब्बत में भी कमोबेश यही स्थिति है। चीन ने खासे प्रतिबंध लगा रखे हैं। वह सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान भी खत्म करने की कोशिश कर रहा है। मलेशिया में हिंदुओं की आबादी 6.4 फीसदी है, लेकिन हिंदुओं को यहां मुस्लिमों के समान अधिकार नहीं है।
इंडोनेशिया में पिछले कुछ सालों में धार्मिक कट्टरता बढ़ गई है और अब अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाने लगा है। हिंदू बड़ी संख्या में निशाने पर हैं। श्रीलंका में भी धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है।