बीआरआई
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चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) को बड़ा झटका लगने वाला है। दरअसल, इटली ने इस परियोजना से बाहर निकलने की तैयारी कर ली है। इसकी चर्चा नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान चीन और इटली के प्रधानमंत्रियों ने की।
आइये जानते हैं कि बीआरआई को लेकर क्या हुआ है? आखिर क्या है चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना? इटली के इस प्रोजेक्ट से हटने की वजह क्या है? क्या पहले भी कोई देश इससे अलग हुआ है?
चीन और इटली के पीएम
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बीआरआई को लेकर क्या हुआ है?
इटैलियन मीडिया ने अपनी हालिया रिपोर्ट्स में कहा है कि G20 शिखर सम्मेलन से इतर पीएम मेलोनी ने चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग से मुलाकात की और बीआरआई से बाहर निकलने की अपनी योजना साझा की। G-20 शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेलोनी ने चीनी सरकार के प्रमुख के साथ हुई बातचीत के बारे में बात की। मेलोनी ने कहा, 'हम अपनी द्विपक्षीय साझेदारी को कैसे गहरा कर सकते हैं, इस पर सौहार्दपूर्ण और रचनात्मक बातचीत हुई। मैं चीन की यात्रा करने की अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखने का इरादा रखती हूं।'
इसके अलावा इटली की प्रधानमंत्री ने कहा कि जिक्र करना उचित है कि इटली बीआरआई के लिए हस्ताक्षर करने वाला एकमात्र जी-7 देश था। उन्होंने आश्वासन दिया कि सिल्क रोड (बीआरआई) छोड़ने से संबंधों से समझौता नहीं होगा, लेकिन फैसला लिया जाना बाकी है।
इससे पहले 'कोरिएरे डेला सेरा' अखबार ने लिखा था कि प्रधानमंत्री मेलोनी ने अपने समकक्ष को बीजिंग के लिए रणनीतिक परियोजना से बाहर निकलने के अपने इरादे से अवगत करा दिया है। हालांकि, ली कियांग ने इटली के अधिकारियों की ओर से पुनर्विचार करने का एक अंतिम प्रयास किया।
BRI Project
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आखिर क्या है बीआरआई परियोजना?
बीआरआई पुराने सिल्क रोड पर आधारित है, जो एक वैश्विक व्यापार और बुनियादी ढांचा योजना थी। यह चीन को पश्चिमी देशों से जोड़ती थी। बीआरआई चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक प्रमुख पहल है। BRI को 2013 में जिनपिंग ने प्रस्तावित किया। ग्रीन फायनेंस एन्ड डेवलपमेंट सेंटर के मुताबिक, अप्रैल 2023 में चीन के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर करके बीआरआई में शामिल होने वाले देशों की संख्या 148 है। इसके साथ ही बीआरआई यूरोपीय संघ के 18 देशों और जी20 के नौ देशों के साथ भी काम कर रहा है।
सांकेतिक तस्वीर
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क्या है इसका उद्देश्य?
इसका उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप को भूमि और समुद्री मार्गों के नेटवर्क से जोड़ना है। चीन की मानें तो इस समझौते का उद्देश्य ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट, रसद, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क सिक्योरिटी और संबंधित बुनियादी ढांचे के विकास को सुविधाजनक बनाना है। इसके अलावा यह रेलवे, सड़क, नागरिक उड्डयन, पावर ग्रिड, सूचना और संचार सहित सीमा पार परियोजनाओं को भी बढ़ावा देती है।
Giorgia Meloni, Li Qiang
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तो अब इटली क्यों अलग हो रहा?
इटली, बीआरआई परियोजना में एकमात्र बड़ा पश्चिमी देश है। हालांकि, अब इसको अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है। इटली के इस परियोजना से दिसंबर तक निकलने की उम्मीद है। इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने रविवार को कहा कि चार साल पहले बीआरआई में शामिल होना जल्दबाजी में किया गया नुकसानदेह फैसला था, हम जल्द बाहर आ सकते हैं।
इटली ने वर्ष 2019 में पिछली सरकार के दौरान बीआरआई में शामिल होने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किया था। क्रोसेटो के मुताबिक, नए सिल्क रूट में शामिल होने का निर्णय एक तात्कालिक और नुकसानदेह कार्य था। इसने इटली को चीन से होने वाले निर्यात को कई गुना बढ़ा दिया, जबकि चीन को इटली से होने वाले निर्यात पर खास असर नहीं पड़ा। अब मुद्दा यह है कि चीन से रिश्ता खराब किए बगैर किस प्रकार बीआरआई से बाहर निकला जाए, क्योंकि यह साझीदार भी है।
Australia
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क्या पहले भी कोई देश इससे अलग हुआ है?
2021 में ऑस्ट्रेलिया इस परियोजना के अलग हो गया था। तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई पीएम स्कॉट मॉरिसन ने चीन के बीआरआई समझौते को रद्द कर दिया था। तब समझौता कॉमनवेल्थ कानूनों के तहत बने फॉरेन-वीटो प्रावधान का उपयोग करते हुए रद्द किया गया था। इसके अलावा अफ्रीकी देश जिबूती इससे छुटकारा पाना चाहता हैं क्योंकि चीन ने अफ्रीकी देश में चल रही परियोजना में सुरक्षा के नाम पर सेना तैनात की थी। इसी चालाकी को भांपकर कुछ अफ्रीकी देश बीआरआई से हट सकते हैं।
वहीं, इंडोनेशिया को बीआरआई में शामिल होने की महंगी कीमत चुकानी पड़ी है। उसे जावा प्रांत में बन रही हाई स्पीड रेलवे परियोजना के लिए रियायतों की अवधि 80 वर्ष और बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक निर्माण कार्यों में देरी के कारण परियोजना की लागत लगभग 40 फीसदी बढ़ गई। इस कारण इंडोनेशिया सरकार को लगभग 47 करोड़ डॉलर का भुगतान अपने खजाने से करना पड़ा। इसको लेकर देश में कई हलकों से सवाल उठाए गए।
बीआरआई
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किस वजह से शक की निगाह में रही बीआरआई परियोजना
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2013 में बीआरआई का एलान किया था। समझा जाता है कि इस परियोजना के पीछे चीन का मकसद अपने देश में बने उत्पादों को दुनियाभर में पहुंचाने का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना और दुनिया में चीन का प्रभाव बढ़ाना है। लेकिन अब कई देशों में परियोजना में खड़ी हुई दिक्कतों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। 2020 और 2021 में कम से कम 40 बीआरआई समझौतों में ऋण शर्तों को लेकर दोबारा बातचीत शुरू हुई थी।
विश्व बैंक, अमेरिका के हार्वर्ड केनेडी स्कूल, एडडेटा और किएल इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकॉनमी के एक साझा अध्ययन के मुताबिक 2008 से 2021 तक चीन 22 देशों को कर्ज बेलआउट देने पर 240 बिलियन डॉलर खर्च कर चुका है। इस रकम में हाल के वर्षों में अधिक वृद्धि दर्ज हुई है। इसकी वजह बीआरआई से संबंधित ऋण चुकाने में बढ़ रही दिक्कतें हैं।
विवादास्पद शर्तें एक बड़ी वजह
बीआरआई समझौते की कई शर्तों को विवादास्पद माना जाता है, चीन ने अपने हितों के मुताबिक इन्हें तय किया है। अमेरिका के जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय के अनुसार कई शर्तें तो ऐसी हैं चीन से लोन वाले देश सार्वजनिक तौर पर यह भी नहीं बता सकते की उन्होंने लोन लिया है।