यूक्रेन विवाद में अब सारा ध्यान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मध्यस्थता पर आ टिका है। शुरुआती तौर पर मैक्रों की कोशिश कामयाब होती दिख रही है। रविवार को इस मुद्दे पर सीधी बातचीत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राजी कर लेना मैक्रों की एक खास उपलब्धि मानी जा रही है। अमेरिका ने शर्त लगाई है कि ये सीधी वार्ता तभी होगी, अगर तब तक रूस यूक्रेन पर हमला नहीं करेगा। समझा जा रहा है कि इस पर पुतिन की सहमति लेने के बाद ही फ्रांस ने प्रस्तावित वार्ता के कार्यक्रम की घोषणा की।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन के बीच सीधी बातचीत 24 फरवरी को होने वाली है। बताया गया है कि उसके बाद दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता होगी। अनुमान लगाया गया है कि कम से कम शिखर वार्ता होने तक यूक्रेन पर हमले का खतरा टल गया है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर आगे तनाव घटाने का रास्ता निकलता है, तो उससे अंतरराष्ट्रीय मामलों में मैक्रों की प्रोफाइल ऊंची होगी।
इस बीच जर्मनी में जनमत भी नाटो के विस्तार के खिलाफ हो गया है। एक ताजा जनमत सर्वे में 53 फीसदी लोगों ने नाटो में यूक्रेन को शामिल करने का विरोध किया। जानकारों का कहना है कि जर्मन सरकार और वहां के लोग यूक्रेन के मुद्दे पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालने के पक्ष में नहीं हैं। रूस जर्मनी और कई अन्य यूरोपीय देशों के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का प्रमुख स्रोत है। फ्रांस में भी अमेरिकी योजना को लेकर जनता में उत्साह नहीं है। बताया जाता है कि इन वजहों से पश्चिमी देश रूस के खिलाफ एकजुट मोर्चा खोलने में नाकाम हो रहे हैं।