चीन की आक्रामकता हिंद-प्रशांत और दक्षिण-पूर्व सागर में लगातार बढ़ रही है। इसे चुनौती देने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में हुए परमाणु पनडुब्बियों के ऑकस समझौते से चीन बौखला उठा है। चीन द्वारा इसके विरोध में लगातार जारी उग्र प्रतिक्रियाओं की कड़ी में एक पूर्व वरिष्ठ चीनी राजनयिक ने यहां तक कह डाला कि हमें अब एटमी हथियारों पर पहले इस्तेमाल न करने की नीति छोड़ देनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में पूर्व चीनी राजदूत शा जुकांग ने कहा है कि हालात को देखते हुए चीन को परमाणु हथियारों को लेकर अपने रुख पर पुनर्विचार कर उसमें सुधार करना चाहिए। जुकांग ने कहा, चीन के ठीक पड़ोस में अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है और नया सैन्य गठबंधन बना रहा है। ऐसे में चीन को 1968 में बनाई सिर्फ जवाबी कार्रवाई की नीति को बदलना होगा।
राजनयिक ने तर्क दिया कि सिर्फ जवाबी कार्रवाई में ही परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की नीति से चीन नैतिक रूप से आगे हो सकता है लेकिन यह तब तक ठीक नहीं है जब तक चीन-अमेरिका में इस बात पर सहमति न हो कि दोनों में से कोई भी पक्ष पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका आगामी समय में चीन को अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी या शत्रु के रूप में देख सकता है।
चीनी हथियार और व्यापार दोनों ही चुनौतियां
पश्चिमी रिपोर्ट्स दावा करती हैं कि परमाणु हथियार विकसित करने वाला पांचवां देश चीन 250 से 300 मिसाइलों से लैस है। चीन ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए कांप्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फॉर ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप सौदे में शामिल होने के लिए आवेदन किया है। इसके जरिये चीन प्रशांत महासागर के जरिये होने वाले व्यापार पर एकछत्र राज करना चाहता है। अमेरिका के लिए चीनी हथियार और व्यापार दोनों ही बड़ी चुनौतियां हैं।