उत्तरी अमेरिका में 99 साल के बाद 21 अगस्त को लगने वाला पूर्ण सूर्यग्रहण खगोल प्रेमियों के लिए सूर्य की परिधि के अध्ययन का बेहतरीन अवसर बन गया है। इसके लिए विश्व भर से खगोल वैज्ञानिक अमेरिका में जुटने वाले हैं। वैज्ञानिकों ने इसके महत्व को देखते हुए इसे ‘द ग्रेट अमेरिकन एकलिप्स’ नाम दिया है। हालांकि 2017 का यह आखिरी ग्रहण भारत में नजर नहीं आएगा।
यह ग्रहण पूरे उत्तरी अमेरिका में लगभग 4000 किमी दूरी तक लगेगा औैर गत सौ वर्षों में इतने बड़े भूभाग में पड़ने वाला पहला ग्रहण होगा। लगभग 2 मिनट 40 सेकेंड की अवधि तक पूर्ण सूर्य ग्रहण रहने के चलते वैज्ञानिकों के लिए इसका महत्व बहुत अधिक है।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने इसके अध्ययन के लिए विशेष व्यवस्थाएं की हैं। नासा के विशेष अभियान ग्लोब (ग्लोबल लर्निंग एंड ऑबजर्वेशन टु बेनिफिट एन्वाइसमेंट) ने एक मोबाइल एप विकसित किया है। जिसके जरिये इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले लोग मोबाइल पर ग्रहण संबंधी डाटा एकत्र कर स्वयं उनका विश्लेषण कर सकेंगे।
नासा का लक्ष्य दस लाख विद्यार्थियों से विश्लेषण करवाने का है। सूर्य और चंद्रमा की लुकाछिपी के संयोग से यहां एरीज के सौर वैज्ञानिक डॉ. वहाबुद्दीन भी उत्साहित हैं। उनका मानना है कि उस दिन कोरोना का गहराई से अध्ययन किया जा सकेगा और उसके बारे में नई बातें सामने आ सकेंगी।
हालांकि एक स्थान पर पूर्ण ग्रहण की अधिकतम अवधि 2 मिनट 42 सेकेंड ही होगी। यह पूर्ण ग्रहण अमेरिका के 14 राज्यों में पड़ेगा। ग्रहण वहां के स्थानीय समयानुसार सुबह सवा दस बजे से दोपहर पौने तीन बजे तक चलेगा।
यूं लगता है सूर्यग्रहण
पूर्ण सूर्यग्रहण तब लगता है, जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा कुछ इस तरह आ जाता है कि पृथ्वी से देखने पर सूर्य पूरी तरह चंद्रमा की ओट में छिपा प्रतीत होता है।