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AUKUS: तीन देशों के गठजोड़ से भड़का फ्रांस, धोखा करार दिया, ईयू दिख रहा बेबस

Fri, 17 Sep 2021 08:16 PM IST
Amit Mandal वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स

सार

इन तीन देशों की संधि से फ्रांस बुरी तरह भड़का हुआ है। फ्रांस के विदेश मंत्रीने इसे ऑस्ट्रेलिया द्वारा पीठ में छुरा भोंकना करार दिया है। इन हालात में ईयू की क्या स्थित है जानिए। 
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अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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चीन के खिलाफ अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के नए सैन्य गठजोड़ ने प्रशांत महासागर क्षेत्र को लेकर ने सवालों को जन्म दे दिया है। इस फैसले ने यूरोप को पूरी तरह चौंका दिया है और अधर में लटका दिया है। वहीं, फ्रांस खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। इस फैसले के बाद यूरोपियन यूनियन उलझन भरी स्थिति में दिखाई दे रहा है। 

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बुधवार को जिस ऑकस (AUKUS) संधि का एलान हुआ उसके तहत अमेरिका और ब्रिटेन के एक्सपर्ट ऑस्ट्रेलिया के परमाणु पनडुब्बी से जुड़ी मदद करने यहां पहुंचेंगे। इसके साथ ही तय हो गया है कि ऑस्ट्रेलिया अब फ्रांस के साथ किए गए गैर-परमाणु पनडुब्बी से जुड़ा सौदा भी रद्द कर देगा। 

बुरी तरह भड़का फ्रांस
इन तीन देशों की संधि से फ्रांस बुरी तरह भड़का हुआ है। फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-व्येस ड्रायन ने इसे ऑस्ट्रेलिया द्वारा पीठ में छुरा भोंकना करार दिया है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को भी निशाने पर लेते हुए कहा कि सहयोगियों के सलाह-मश्विरा किए बिना इस संधि की अचानक घोषणा करना धोखा और एकतरफा फैसला है। 
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ब्रसेल्स में अधिकारियों ने सीएनएन को बताया कि ऑकस के एलान के समय को नकारात्मक रूप में देखा गया है क्योंकि विदेशी मामलों पर यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि गुरुवार दोपहर को इंडो-पैसिफिक के लिए अपनी रणनीति तैयार कर रहे थे। 

बहरहाल, ईयू अब असमंजस में दिख रहा है और उसकी नाराजगी सामने आ रही है। एक सीनियर अधिकारी ने सीएनएन को बताया कि अंग्रेजी बोलने वाले देश चीन के खिलाफ आक्रामक रहे हैं। ये वही देश हैं जिन्होंने अफगानिस्तान और इराक को तबाह किया और नतीजा सब जानते हैं। 

हालांकि, चीन को लेकर ईयू का नजरिया अमेरिका से बिल्कुल अलग है। ईयू चीन के साथ उलझने के बजाय उसके साथ व्यापारिक और आर्थिक रिश्ते बढ़ाना चाहता है। 

अधिकारियों का मानना है कि ऐसा करके वे न सिर्फ चीन को मानवाधिकार के मुद्दे पर राजी कर सकेंगे बल्कि बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच की दूरी को भी कम कर सकेंगे। कुछ लोगों का मानना है कि औकस के गठन के एलान से वैश्विक पटल पर ईयू की हैसियत कम करने की कोशिश हुई है। 

अब क्या करेगा ईयू 
ये सबसे बड़ा सवाल है। यूरोप की सुरक्षा को लेकर अब क्या हालात होंगे इस पर कोई एकमत नहीं है। औकस के गठन के बाद अब फ्रांस ही यहां एकमात्र ताकतवर देश रह गया है। अब उसके सामने अपनी असल क्षमता दिखाने की चुनौती है। 

एक ईयू अधिकारी का कहना है कि औकस के गठन और अफगानिस्तान में बने हालात के बाद फ्रांस का वो नजरिया मजबूत हुआ है जिसमें उसने कहा था कि ईयू को प्रशांत महासागर में अपने हितों की रक्षा के लिए आगे आना होगा। 

इस फैसले के बाद ईयू का हर देश अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद करने को मजबूर होगा। ये देश किसी संघर्ष वाले क्षेत्रों में अपने सैनिक तैनात करने को लेकर एक सीमा तय करेंगे। 
एक राजनयिक का कहना है कि ईयू के तटस्थ देश ऑस्ट्रिया, आयरलैंड, फिनलैंड और स्वीडन कभी भी संघर्ष वाले इलाकों में अपने सैनिक तैनात नहीं करेंगे। वह कहते हैं कि अब हम अपने सैनिकों को तीसरे देशों में ट्रेनिंग दे सकते हैं और शांति के लिए सीमा पर सैनिक तैनात कर सकते हैं। 

सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी स्टडीज के रिसर्च डायरेक्ट स्टीवन ब्लॉकमैंस कहते हैं कि ये देश फ्रांस की तरह स्टैंड लेने की बजाय सहयोग की भावना के साथ आगे बढ़ेंगे। वह कहते हैं, एक और बड़ा देश जर्मनी हमेशा कहता आया है कि रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में इस तरह की नीति  पूरी तरह समावेशी होनी चाहिए, 27 सदस्यों को स्वीकार्य होना चाहिए।  

वह कहते हैं ऑकस की घोषणा फ्रांस को फ्रांस को इन देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों पर पुनर्विचार करने और यूरोपीय रक्षा सहयोग में अपनी महत्वाकांक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए साथी सदस्य राज्यों के साथ कड़ी मेहनत करने के लिए मजबूर करेगी। 

ईयू ने चीन और अमेरिका के बीच संतुलन साधने में वर्षों का वक्त लगाया है और एक सॉफ्ट पावर के तौर पर बर्ताव किया है। इसके विपरित औकस की योजना एक परंपरागत हार्ड पावर का प्रतीक है, इसने ईयू को पूरी तरह ऊहापोह में डाल दिया है और फ्रांस तो जैसे अधर में ही लटक गया है। 

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