जनवरी 2020 में हुए फेज-1 समझौते के तहत चीन अमेरिका से 2017 की तुलना में 200 अरब डॉलर की अधिक वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने पर राजी हुआ था। ये खरीदारी उसे 2021 के अंत तक करनी थी। लेकिन ये समझौता होने के कुछ ही समय बाद ट्रंप प्रशासन ने चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ दिया। इससे फेज-1 समझौता खटाई में पड़ गया। अमेरिका के पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकॉनमिक्स के मुताबिक चीन ने जितनी खरीदारी का वादा किया था, उसके सिर्फ 62 फीसदी की खरीदारी ही उसने की है।
ट्रंप प्रशासन ने व्यापार युद्ध के तहत चीन से आयात होने वाली वस्तुओं पर ऊंची दर से शुल्क लगा दिए। बीजिंग स्थित चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज में व्यापार विशेषज्ञ गाओ लिंगयुन ने ग्लोबल टाइम्स से कहा कि टाय के सीधी वार्ता करने के इरादे से जाहिर है कि ऊंचे शुल्क लगाने के अमेरिकी कदम का उलटा असर हुआ। अमेरिका ना तो चीन से आयात होने वाली वस्तुओं का विकल्प ढूंढ पाया, न ही अपनी कंपनियों को चीन में कारोबार समेट कर लौटने के लिए मजबूर कर सका। दूसरी तरफ ऊंचे शुल्क के कारण चीनी वस्तुएं महंगी हो गईं, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं को नुकसान हुआ। उसका अमेरिका में महंगाई बढ़ाने में भी योगदान रहा है।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका-चीन वार्ता का क्या नतीजा रहता है, उसमें दुनिया की दिलचस्पी रहेगी। अगर उन्होंने अपने मतभेदों को हल करने का कोई रास्ता निकाला, तो उसका वैश्विक बाजार को भी मिलेगा।