अफगानिस्तान के पत्रकार और तालिबान रीजिस्टन्स फोर्स (एनआरएफ) के प्रवक्ता फहीम दशती की तालिबान और फोर्स के बीच हुई हिंसक झड़प में सोमवार को मृत्यु हो गई। एनआरएफ ने कहा कि दशती की मौत का कारण पाकिस्तानी वायुसेना का ड्रोन हमला था। हालांकि तालिबान ने इस दावे का खंडन किया है। तालिबान का कहना है कि दशती फोर्स के कमांडरों के बीच आंतरिक संघर्ष के परिणामस्वरूप मारे गए।
पंजशीर घाटी से तालिबान के खिलाफ प्रतिरोध आंदोलन का नेतृत्व करने वाले दशती तालिबान की आंखों की किरकिरी माने जाते थे क्योंकि वे मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जब तालिबान ने दावा किया कि पंजशीर घाटी के शुतुल जिले पर उन्होंने कब्जा कर लिया है, तब दशती ने एक वॉयस नोट के माध्यम से शुतुल जिले पर कब्जे से इनकार किया था। उन्होंने यह भी बताया था कि तालिबान को पीछे जाने पर मजबूर कर दिया गया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे फेडरेशन ऑफ अफगान जर्नलिस्ट्स के सदस्य भी थे। फहीम का पत्रकारिता में लंबा करियर रहा था। वह सुभ-ए-काबुल साप्ताहिक पत्रिका के प्रबंध निदेशक रहे। उनकी मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए एनआरएफ के नेता अहमद मसूद ने अपने ट्वीट में कहा, "फहीम दशती एक दोस्त और भाई थे। वह स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति और अपने आदर्शों के लिए खड़े थे। वे अपनी मातृभूमि के लिए एक नायक की तरह शहीद हो गए। मैं एक प्रतिभाशाली अफगान पत्रकार के निधन पर बहुत दुखी हूं। अफगानिस्तान नेशनल जर्नलिस्ट्स यूनियन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शुएब फाना ने भी कहा है, दशती मीडिया की स्वतंत्रता चाहते थे। उन्होंने इस यूनियन में आठ साल तक काम किया था। उनकी मृत्यु की खबर ने हमें परेशान कर दिया है।
दशती ने पूरे अफगान के लिए लड़ने की बात की थी
पिछले महीने एक भारतीय न्यूज चैनल से बात करते हुए दशती ने कहा था, 'हम सिर्फ एक प्रांत के लिए नहीं बल्कि पूरे अफगानिस्तान के लिए लड़ रहे हैं। हम अफगानों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में चिंतित हैं। उन्होंने कहा था कि तालिबान को समानता और अधिकार का आश्वासन देना होगा।
एक बार मौत को चकमा दे दिया था
दशती बहुत पहले एक बार अपनी मौत को चकमा दे चुके थे। वे उस आत्मघाती हमले में बाल-बाल बच गए थे जिसमें अहमद मसूद के पिता अहमद शाह मसूद की मौत नौ सितंबर, 2001 को हुई थी। यह हमला अमेरिका पर 11 सितंबर के हमलों से कुछ दिन पहले हुआ था। अहमद शाह मसूद पंजशीर घाटी के सबसे बड़े कमांडर थे। वे तालिबान के बड़े विरोधियों और कट्टर दुश्मनों में एक माने जाते थे। इसलिए तालिबान और अलकायदा ने मिलकर 9/11 के हमले से दो दिन पहले उनकी फिदायीन हमले में उनकी हत्या कर दी। अब उनके बेटे अहमद मसूद भी अपने पिता की तरह तालिबान से मुकाबला कर रहे हैं।
तालिबान के विरोध का प्रतीक बनी पंजशीर की लड़ाई
पंजशीर की लड़ाई तालिबान के प्रतिरोध का सबसे प्रमुख उदाहरण है। पंजशीर घाटी के लोग शुरू से ही तालिबान के विरोधी रहे हैं। पंजशीर घाटी अफगानिस्तान का वो दुर्गम इलाका है जहां तालिबान पहले के शासन में भी कब्जा नहीं कर पाया था। तालिबान ने सोमवार को दावा किया कि उसने पंजशीर पर कब्जा कर लिया है। आरोप है कि पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर तालिबान ने पंजशीर घाटी के नेताओं को निशाना बनाया।
हालांकि अहमद मसूद ने सोमवार को अपने फेसबुक अकाउंट पर एक आडियो मैसेज जारी कर कहा कि उनके लड़ाके अब भी पंजशीर में तालिबान से मुकाबला कर रहे हैं। इस मैसेज में मसूद ने कहा है कि वह अपने खून की आखिरी बूंद तक तालिबान से जंग लड़ते रहेंगे। मसूद ने पाकिस्तान को खरी खोटी सुनाते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यह अपील की है कि वे तालिबान से लड़ने में उनका सहयोग करें।