पर्यवेक्षकों का कहना है कि ईटीआईएम ने अपनी गतिविधियों पर जो लगाम लगाई है, उसके पीछे तालिबान की कितनी भूमिका है, यह साफ नहीं है। फिलहाल, तालिबान की प्राथमिकता चीन के साथ संबंध बनाने की है। अमेरिकी फौज की वापसी के बाद अफगानिस्तान पर अपना दबदबा कायम करने के लिहाज से इसे वह जरूरी समझता है। लेकिन जानकारों के मुताबिक इसके लिए वह ईटीआईएम के आधार को तोड़ने को कोशिश करेगा, इसकी संभावना नहीं है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपे एक विश्लेषण के मुताबिक हाल में अफगानिस्तान में तालिबान को जो कामयाबियां मिली हैं, उनके पीछे ईटीआईएम जैसे गुटों के सहयोग की भी भूमिका रही है। इस विश्लेषण के मुताबिक तालिबान ऐसे गुटों का इस्तेमाल करने में माहिर है। लेकिन वह चीन के लिए ईटीआईएम से दुश्मनी मोल लेगा, यह उसके लिए फायदे का सौदा नहीं होगा।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने हाल में कहा था कि आज का तालिबान 1990 के दशक के तालिबान से अलग है। अब यह ऐसे आतंकवादी गुटों का एक मेल है, जो कई देशों में सक्रिय हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ईटीआईएम भी इन गुटों में एक है। उनके मुताबिक अगर तालिबान ने उसके खिलाफ कार्रवाई की, तो उससे वह उन गुटों का भी भरोसा खो देगा, जो उसकी ताकत का आधार हैं। ऐसे में तालिबान खुद अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारेगा, इसकी संभावना नहीं है।
विश्लेषकों ने कहा है कि एक बार काबुल की सत्ता पर काबिज होने के बाद तालिबान को चीन की आज जितनी जरूरत नहीं रह जाएगी। उनके मुताबिक तालिबान नेतृत्व ने जरूर हाल में कहा है कि वह चीन को दोस्त देश मानता है, लेकिन तालिबान के अंदर सबकी ऐसी सोच है, इसके कोई ठोस संकेत नहीं हैँ।