पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कादिर खान।
- फोटो : Amar Ujala
पाकिस्तान को परमाणु हथियारों से संपन्न बनाने वाले न्यूक्लियर साइंटिस्ट अब्दुल कादिर खान का रविवार को इस्लामाबाद में निधन हो गया। खान कुछ दिनों पहले कोरोना से संक्रमित हो गए थे, जिसके बाद उनका इलाज जारी था। खान के निधन पर पूरे पाकिस्तान में शोक जताया जा रहा है। लोग उनके पोस्टर लेकर सड़कों पर भी निकले हैं। इसकी एक स्पष्ट वजह यह है कि वो एक्यू खान ही थे, जिन्होंने पाकिस्तान के लिए परमाणु हथियार बनाकर उसे भारत समेत पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बना दिया। हालांकि, बहुत कम लोगों को ही यह पता है कि पाकिस्तान को इस तरह परेशानी का सबब बनाने वाले एक्यू खान का जन्म भारत के भोपाल में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती 15 साल इसी देश में काटे थे।
पहले जानें- कौन थे अब्दुल कादिर खान?
अब्दुल कादिर खान का जन्म भारत के भोपाल में 1936 में हुआ था। उनके जीवन के 15 साल इसी देश में बीते। इनमें विभाजन के बाद के पांच साल भी शामिल हैं। हालांकि, 1952 में उनका परिवार पाकिस्तान में जाकर बस गया, जहां उनकी आगे की पढ़ाई हुई। 1961 में अब्दुल कादिर पढ़ाई के लिए यूरोप चले गए। पहले उनकी पढ़ाई पश्चिमी बर्लिन में हुई और फिर उन्होंने हौलेंड के डेल्फ्ट में टेक्निकल यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया। यहां से 1967 में उन्होंने मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में डिग्री हासिल की।
परमाणु तकनीक के संपर्क में कैसे आए एक्यू खान
एक्यू खान ने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद 1972 में मेटालर्जी से पीएचडी पूरी की। इसी साल मई में उन्होंने नीदरलैंड्स की फिजिकल डायनैमिक रिसर्च लैब्स (एफडीओ) में काम शुरू किया। एफडीओ परमाणु पदार्थों के संवर्धन के लिए सेंट्रिफ्यूज बनाने वाले कंपनी 'अल्ट्रा सेंट्रिफ्यूज नीदरलैंड्स' (यूसीएन) की सबकॉन्ट्रैक्टर थी। उधर यूसीएन यूरेंको (यूरेनियम संवर्धन संघ) का भी हिस्सा था।
एफडीओ में काम शुरू करने के एक हफ्ते के अंदर ही एक्यू खान नीदरलैंड्स के अलमेलो में स्थित यूसीएन के परमाणु संवर्धन केंद्र पहुंच गए। खान यूरेंको के सेंट्रिफ्यूज में इस्तेमाल होने वाली तकनीक को समझने में जुटे थे। पाकिस्तानी वैज्ञानिक को इस केंद्र में आने की इजाजत नहीं मिली थी, लेकिन उन्होंने अपने बॉस को मनाकर कई बार इस केंद्र का दौरा किया।
परमाणु तकनीक की जानकारी जुटाने के दौरान रडार पर आए खान
हालांकि, इस बीच नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियों को शक हो गया कि खान परमाणु तकनीक से जुड़ी संवेदनशील जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं। दरअसल, खान इस केंद्र में जिस तकनीक के बारे में पता करने में जुटे थे, वो उनके प्रोजेक्ट का हिस्सा ही नहीं थी।
भारत ने किया परमाणु परीक्षण, तो खान ने दिया पाक को मदद का प्रस्ताव
18 मई 1974 को भारत ने अपना पहला शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण किया। इस पर पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका ने भी नाराजगी जाहिर की। बताया जाता है कि यही वो समय था, जब पाकिस्तानी हुक्मरान ने भी परमाणु तकनीक हासिल करने के लिए दुनियाभर से मदद मांगना शुरू कर दिया। अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में साल 2018 में छपे एक लेख में कहा गया था, "इस घटना ने डॉ खान के भीतर छिपे राष्ट्रवाद को एक तरह से चुनौती दी और पड़ोसी मुल्क से बराबरी करने में पाकिस्तान की मदद करने की कोशिश करने लगे। इसी सिलसिले में एक्यू खान ने सितंबर में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को चिट्ठी लिखी। इसमें उन्होंने पाकिस्तान को परमाणु तकनीक दिलाने में मदद का प्रस्ताव दिया।
निगरानी में होने के बावजूद एक्यू खान को मिला संवेदनशील प्रोजेक्ट
इस दौरान खान को यूसीएन के अलमेलो केंद्र में एक बेहद अहम जिम्मेदारी मिली। दरअसल, जर्मनी को परमाणु संवर्धन के लिए सबसे अहम मानी जाने वाली अपनी सेंट्रिफ्यूज तकनीक नीदरलैंड्स को देनी थी। चौंकाने वाली बात यह है कि डच अधिकारियों की निगरानी में होने के बावजूद जर्मनी से मिली इस तकनीक को समझने की जिम्मेदारी एक्यू खान को ही दी गई। तब कुछ रिपोर्ट्स में यह सामने आया था कि एक्यू खान ने 16 दिन तक बिना किसी निगरानी के इन सेंट्रिफ्यूज की जानकारी जुटाई।
अमेरिका ने गिरफ्तारी से बचाया, आखिर क्या थी मंशा?
इस बीच जब नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियों को इस बात के पुख्ता सबूत मिले थे कि एक्यू खान परमाणु तकनीक से जुड़ी काफी खुफिया जानकारी जुटा चुके हैं। अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार करने की योजना भी तैयार कर ली। लेकिन ऐन मौके पर अमेरिकी खुफिया विभाग ने दखल देकर डच अफसरों को खान को गिरफ्तार न करने के लिए मना लिया। अमेरिका नहीं चाहता था कि नीदरलैंड्स का खुफिया विभाग खान की आगे जांच करे।
अमेरिकी अधिकारियों के विश्वास दिलाने के बावजूद डच अधिकारियों ने खान की निगरानी जारी रखी। लगातार बढ़ती चिंताजनक गतिविधियों के बावजूद उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। लेकिन नीदरलैंड्स की सरकार ने अक्टूबर 1975 में उन्हें एफडीओ के परमाणु संवर्धन से जुड़े कामों से हटा लिया। इसके बाद स्विट्जरलैंड में रखे गए एक परमाणु कार्यक्रम में उन्हें कथित तौर पर इस तकनीक से जुड़े कई चौंकाने वाले सवाल पूछते भी सुना गया।
1975 में नीदरलैंड्स छोड़ा, पाकिस्तान पहुंचे
दिसंबर 1975 में एक्यू खान ने अचानक ही एफडीओ छोड़ दिया और पाकिस्तान पहुंच गए। यहां वे अपने साथ परमाणु हथियार तैयार करने के लिए एफडीओ से चुराए गए सेंट्रिफ्यूज के ब्लूप्रिंट्स और बाकी जरूरी पुर्जों की जानकारी लेकर पहुंचे थे। इतना ही नहीं खान ने ऐसी 100 कंपनियों की जानकारी भी पाकिस्तान लेकर पहुंचे थे, जो सेंट्रिफ्यूज से जुड़े पुर्जे और परमाणु पदार्थ मुहैया करा सकें।
पाकिस्तान के लिए शुरू किया परमाणु कार्यक्रम
1976 में अब्दुल कादिर खान ने पाकिस्तान के परमाणु ऊर्जा आयोग (पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन) के लिए काम करना शुरू किया। हालांकि, यहां उनकी वैज्ञानिकों के साथ बहस हो गई, जिसे सुलझाने के लिए खुद पीएम भुट्टो को आगे आना पड़ा। भुट्टो ने एक्यू खान को पाकिस्तान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रमों का खुला नियंत्रण सौंप दिया। इसी के तहत खान ने सबसे पहले 31 जुलाई 1976 को इंजीनियरिंग रिसर्च लैब (ईआरएल) की शुरुआत की। इस लैब में सिर्फ यूरेनियम की संवर्धन क्षमताओं पर रिसर्च किया जाना था।
1978 में खान द्वारा गठित इस लैब ने जर्मनी की डिजाइन के आधार पर पी-1 सेंट्रिफ्यूज के प्रोटोटाइप बनाने में कामयाबी हासिल की। यह उसी डिजाइन की कॉपी थी, जिसे समझने का काम अब्दुल कादिर खान को यूरेंको में मिला था। आखिरकार 4 अप्रैल को पाकिस्तान ने कहुटा स्थित केंद्र में परमाणु संवर्धन में सफलता हासिल की।
चीन से मिली परमाणु बम बनाने की तकनीक
परमाणु संवर्धन में सफलता मिलने के बावजूद पाकिस्तान के लिए न्यूक्लियर हथियार बनाना दूर की कौड़ी था। ऐसे में खान ने चीन के 1966 में परमाणु टेस्ट के लिए इस्तेमाल हुए बम के ब्लूप्रिंट हासिल कर लिए। बताया जाता है कि एक अरब देश ने भी इस दौरान एक्यू खान को मदद की पेशकश की।
1980 के मध्य में तैयार कर लिया वेपन्स ग्रेड यूरेनियम
पाकिस्तान ने 1980 के मध्य तक परमाणु हथियार तैयार करने लायक यूरेनियम संवर्धन कर लिया। केआरएल ने इस दौरान संवर्धन में बढ़त हासिल करने के साथ मिसाइल डिलीवरी सिस्टम पर भी काम शुरू कर दिया। लेकिन इस बीच खान ने चोरी की हुई तकनीक को बाहरी देशों को बेचने का भी समझौता कर लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पश्चिमी देशों को घरेलू स्तर पर पाकिस्तान के परमाणु हथियार बनाने की कोशिशों का अंदाजा था, लेकिन इस तकनीक को दूसरे देशों को बेचने की एक्यू खान की हरकत के बारे में किसी को पता नहीं चल पाया था।
जब पाकिस्तान की मदद से ईरान के हाथ लग गई परमाणु तकनीक
अब्दुल कादिर खान और उनके नेटवर्क की मदद से ईरान को भी परमाणु तकनीक मिलना शुरू हुई। दोनों के बीच यह समझौता 1995 तक चला। तब तक पाकिस्तान पी-2 सेंट्रिफ्यूज (परमाणु संवर्धक) की पूरी तकनीक ईरान को दे चुका था। हालांकि, पाकिस्तान सरकार ने कहा कि पी-1 के कलपुर्जों के निर्यात के बाद ईरान को और कोई तकनीक नहीं दी गई।
एक्यू खान ने 1987 में कथित तौर पर ईरान के साथ 50 हजार सेंट्रिफ्यूज बनाने का समझौता कर लिया। 1988 आते-आते कुछ खुफिया रिपोर्ट्स में इस बात का खुलासा हुआ कि ईरान के कुछ वैज्ञानिकों ने पाकिस्तान में ट्रेनिंग हासिल की है। 1989 तक ईरान के पास पहले कुछ सेंट्रिफ्यूज होने की बात की पुष्टि हो गई।
2004 में टीवी के सामने आकर कबूला था गुनाह
2004 में अब्दुल कादिर खान ने टीवी के सामने आकर कबूला था कि उन्होंने पाकिस्तान में परमाणु हथियार लायक यूरेनियम तैयार करने के बाद इसकी तकनीक ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया को बेची। उनके इस कबूलनामे के बाद पाक सरकार ने उन्हें हिरासत में ले लिया। हालांकि, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति और तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन्हें माफी भी दे दी। इसके बाद उन्हें नजरबंद रखा गया। लेकिन पांच साल नजरबंद रहने के बाद आखिरकार कोर्ट ने उन्हें आजाद कर दिया।