न्यूजीलैंड के पास मौजूद द्वीप समूह न्यू कैलेडोनिया में रविवार को आजादी के सवाल पर जनमत संग्रह होगा। अभी ये द्वीप 150 साल से फ्रांस का गुलाम है। ये द्वीप समूह खनिज पदार्थों से भरपूर है। इसलिए यहां किसका शासन रहेगा, इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी पैदा हो गई है।
कोरोना महामारी के पहले दौर में न्यू कैलेडोनिया में एक भी मौत नहीं हुई थी। लेकिन डेल्टा वैरिएंट के कारण फैली दूसरी लहर में यहां बहुत नुकसान हुआ। सितंबर के बाद से यहां 279 लोगों की मौत हो चुकी है। उनमें ज्यादातर इस द्वीप समूह के मूलवासी कनाक समुदाय के लोग हैं। इस द्वीप समूह की आबादी दो लाख 86 हजार है। इसमें 42 फीसदी हिस्सा कनाक समुदाय के लोगों का है। आबादी में 27 फीसदी हिस्सा यूरोपीय लोगों का है, जिनमें ज्यादातर फ्रेंच हैं।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को होने वाले मतदान पर चीन का गहरा साया है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि ये द्वीप समूह जब भी आजाद होगा, उसके बाद यहां चीन की भूमिका बढ़ जाएगी। इस द्वीप में निकिल का बड़ा भंडार है। पश्चिमी देशों को अंदेशा है कि आजाद होने के बाद न्यू कैलिडोनिया चीन की तरफ झुक जाएगा।
जनमत संग्रह में एक लाख 80 हजार लोगों को वोट डालने का अधिकार है। कनाक समुदाय के सभी बालिग लोग इनमें शामिल हैं। उनके अलावा जो भी व्यक्ति 20 वर्ष से द्वीप समूह में रह रहा है, वह वोट डाल सकेगा। 1998 में हुए समझौते के तहत 2018 में न्यू कैलिडोनिया में पहला जनमत संग्रह कराया गया। तब 43.3 फीसदी लोगों ने आजादी के पक्ष में वोट डाले। 2020 में दूसरा जनमत संग्रह हुआ, जिसमें 46.7 फीसदी लोगों ने आजादी का समर्थन किया।
आलोचकों का कहना है कि समझौते के तहत फ्रांस 2022 तक तीसरा जनमत संग्रह करवाने का इंतजार कर सकता था। लेकिन उसने महामारी के बीच ही इसे करवाने का फैसला किया। एफएलएनकेएस ने कहा है कि इसके पीछे मकसद आजादी समर्थकों को मतदान के उचित अवसर से वंचित करना है।