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चाहें ट्रंप पार्टी में रहें या बाहर जाएं, रिपब्लिकन पार्टी तो नस्लभेद की राह पर ही चलेगी!

Thu, 03 Jun 2021 06:09 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

विश्लेषकों का कहना है कि नस्लवाद को जिंदा रखने के लिए पार्टी कई उपायों का सहारा ले रही है। इनमें अपने शासन वाले राज्यों में मतदान संबंधी नियमों को बदलना, अमेरिका के नस्लीय इतिहास की चर्चा करने वाले समूहों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना, बड़े शहरों में अपराध को नस्ल से जोड़ना आदि शामिल है...
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कैपिटल हिल में हुई हिंसा - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अमेरिका में अब चाहे डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के नेता रहें या नहीं, अगले काफी समय तक ये पार्टी नस्लवाद को अपना मुख्य मुद्दा बनाए रखेगी। ये बात पार्टी समर्थकों के बीच कराए गए एक हालिया सर्वे से सामने आई है। उसका निष्कर्ष है कि आने वाले वर्षों में नस्लवाद पर राजनीतिक बहस को जिंदा रखना रिपब्लिकन पार्टी की प्रमुख रणनीति रहेगी।

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विश्लेषकों का कहना है कि नस्लवाद को जिंदा रखने के लिए पार्टी कई उपायों का सहारा ले रही है। इनमें अपने शासन वाले राज्यों में मतदान संबंधी नियमों को बदलना, अमेरिका के नस्लीय इतिहास की चर्चा करने वाले समूहों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना, बड़े शहरों में अपराध को नस्ल से जोड़ना, आव्रजन रोकने का संकल्प जताना और बहुसंख्यक श्वेत समुदाय को अच्छी लगने वाली बातें जोरशोर से कहना शामिल है। इन मुद्दों पर भावनाएं भड़काने के पीछे मकसद डेमोक्रेटिक पार्टी को श्वेत समुदाय का विरोधी बताना है। डेमोक्रेटिक पार्टी की छवि अलग-अलग जन समूहों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी की है। जानकारों का कहना है कि रिपब्लिकन पार्टी अपनी इस रणनीति के तहत स्थानीय स्कूलों के प्रबंधन मंडल से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक में नस्लीय मुद्दों को हवा दे रही है। इसके लिए सोशल मीडिया का भी खूब इस्तेमाल किया जा रहा है।

हाल में वेबसाइट एक्सियोस.कॉम के लिए इप्सोस एजेंसी ने जो सर्वे किया, उससे इस रणनीति के पीछे का कारण स्पष्ट हुआ। सर्वे रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए वेबसाइट एक्सियोस ने लिखा है- ‘नस्लवाल के मुद्दे को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट नेता और समर्थक जिस रूप में देखते हैं, उसके बीच गहरी खाई है। इस सवाल पर दोनों पार्टियों के समर्थकों में 66 फीसदी का अंतर उभरा कि क्या अमेरिका में ब्लैक नागरिकों को बराबरी के स्तर पर लाने के लिए आगे और कदम उठाए जाने चाहिए। इस सवाल पर कि क्या पिछले साल की घटनाओं ने यह साफ किया कि अमेरिका में अभी भी नस्लभेद है, दोनों पार्टियों के समर्थकों के बीच 48 फीसदी का अंतर सामने आया। क्या विरोध प्रदर्शन समाज के भले में हैं, इस सवाल पर उनके बीच 49 प्रतिशत का अंतर था।’
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सर्वे से सामने आया कि श्वेत समुदाय की बहुसंख्या संस्थागत नस्लभेद को दूर करने लिए प्रस्तावित सुधारों के खिलाफ है। विश्लेषकों के मुताबिक रिपब्लिकन पार्टी इस भावना को अपनी राजनीतिक ताकत बनाए रखना चाहती है। सर्वे एजेंसी इप्सोस पब्लिक अफेयर्स के विश्लेषक क्रिस जैकसन ने लिखा है कि ऊपरी तौर पर नस्ल का मुद्दा सियासी तौर पर नुकसानदेह लग सकता है, क्योंकि अमेरिकियों का बहुमत ब्लैक नागरिकों को बराबरी के स्तर पर लाने का समर्थक है। लेकिन अगर बारीकी से देखें, तो रिपब्लिकन पार्टी की रणनीति स्विंग वोटरों के एक खास समूह पर केंद्रित है। मसलन, सर्वे के दौरान देखा गया कि सिर्फ 20 फीसदी श्वेत लोगों ने पुलिस सुधार की मांग का समर्थन किया। 50 फीसदी श्वेत लोगों ने कहा कि मीडिया पुलिस की क्रूरता और पुलिस में मौजूद नस्लभेद से जुड़ी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता है।

क्रिस जैकसन के मुताबिक गौरतलब यह है कि जो लोग खुद को किसी पार्टी का समर्थक नहीं मानते, उनमें भी 40 प्रतिशत श्वेत ऐसे हैं, जो मानते हैं कि ब्लैक नागरिकों को समानता देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का नुकसान श्वेत समुदाय को झेलना पड़ता है। रिपब्लिकन पार्टी की रणनीति ऐसे लोगों को अपने पाले में लाने की है और ये रणनीति अभी जारी रहने वाली है।

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