कभी ट्रंप तो कभी पुतिन ग्रीनलैंड की कीमत लगाते नजर आते हैं। ऐसे में ये समझना जरुरी हो जाता है की क्या आज के दौर में एक देश, दूसरे देश को खरीद सकता है? चलिए आपको ट्रंप–ग्रीनलैंड विवाद से समझाने की कोशिश करते हैं इंटरनेशनल लॉ क्या कहता है.
इससे पहले आपको बता दूं की इस वीडियो में वो कौन-कौन से सवाल हैं जिसके जवाब से हम आपको दोचार करवाने वाले हैं। सवाल है क्या किसी देश को वैसे ही खरीदा जा सकता है जैसे कोई जमीन, फ्लैट या कंपनी खरीदी जाती है? क्या आज के दौर में पैसा देकर किसी देश या उसके इलाके को खरीदा जा सकता है? और अगर ऐसा संभव है तो क्या वहां रहने वाले लोगों की कोई राय मायने नहीं रखती भी है या नहीं? ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क ने साफ-साफ कह दिया “नॉट फॉर सेल” इसके बावजूद भी डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को खरीदने की बात क्यों कर रहे हैं?
आसान भाषा में समझते है - अंतर्राष्ट्रीय कानून क्या कहता है? इतिहास में जमीन कैसे खरीदी-बेची गई? और क्या आज के दौर में ऐसा करना मुमकिन है या नामुमकिन है?
दरअसल ये सवाल तब उठा जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से यह इच्छा जताई कि अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदना चाहता है। ग्रीनलैंड कोई छोटा टापू नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है।
आपको बता दे की ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है। यानी उसकी अपनी सरकार है, लेकिन वह डेनमार्क के अधीन आता है। जैसे ही ट्रंप का बयान सामने आया, डेनमार्क ने साफ शब्दों में कह दिया ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।
इस एक बयान ने पूरी दुनिया में एक बड़ी बहस छेड़ दी क्या वाकई एक देश दूसरे देश या उसके क्षेत्र को खरीद सकता है?
इंटरनेशनल लॉ क्या कहता है?
सीधी और आसान भाषा में समझते है- आज के आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक, किसी देश को जबरदस्ती खरीदना या उसके इलाके पर कब्जा करना गैरकानूनी है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) का आर्टिकल 2(4) साफ कहता है कि किसी भी देश की संप्रभुता यानी सॉवरेन्टी का सम्मान किया जाना चाहिए। मतलब- कोई भी देश ताकत, दबाव या धमकी के जरिए किसी दूसरे देश की जमीन नहीं ले सकता। देश कोई प्रॉपर्टी नहीं होते, जिन्हें खरीद-बेच दिया जाए। देश का मतलब होता है- वहां की जनता, सरकार, कानून, संस्कृति और उनकी पहचान। इसलिए सरकारें कंपनियों की तरह अपने देश की “मालिक” नहीं होतीं कि उसे बेच सकें।
अब ऐसे में ये भी सवाल उठता है की युद्ध, दबाव के जरिए नहीं लेकिन क्या सहमति से खरीद संभव है?
कागजों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून यह कहता है कि अगर दोनों देश स्वेच्छा से सहमत हों, तो क्षेत्रीय हस्तांतरण संभव हो सकता है। लेकिन आज के दौर में इसमें एक और बहुत बड़ा फैक्टर जुड़ गया है- लोगों का आत्मनिर्णय का अधिकार (Right to Self-Determination)। मतलब यह कि उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों से पूछा जाएगा- वे किस देश के साथ रहना चाहते हैं? या वे स्वतंत्र रहना चाहते हैं?
अगर वहां की जनता सहमत नहीं है, तो सिर्फ दो सरकारों की डील से वह समझौता वैध नहीं माना जाएगा। यानी ग्रीनलैंड के मामले में- डेनमार्क ही नहीं, ग्रीनलैंड के लोगों की मंजूरी भी जरूरी होगी।
अब आपको बताते है की ट्रंप के “हार्ड वे” बयान पर विवाद क्यों हो रहा या पहले भी क्यों हो चूका है?
दरअसल, ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर “आसान तरीके” से ग्रीनलैंड नहीं मिला, तो “हार्ड वे” से लिया जा सकता है। यानी इशारों-इशारों में उन्होंने दबाव, रणनीति या ताकत की बात की।
यहीं से मामला और संवेदनशील हो गया। क्योंकि इंटरनेशनल लॉ में बलपूर्वक क्षेत्रीय अधिग्रहण पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसी वजह से ट्रंप के बयान को सिर्फ एक रियल एस्टेट डील की तरह नहीं, बल्कि एक जियो-पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी के तौर पर देखा गया।
चलिए अब जरा समय का पहिया घुमाते है और आपको भूतकाल में लिए चलते है और बताते है की इतिहास में जमीन कैसे खरीदी गई? क्योंकि ये सवाल उठना लाजमी है की अगर आज इतना मुश्किल है, तो पहले कैसे हो गया?
इसे कुछ सरल उदाहरण के मदद से समझते है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं-
• 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइसियाना खरीदा
• 1867 में अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीदा
लेकिन एक बात समझिए- ये सौदे औपनिवेशिक युग में हुए थे। उस दौर में लोगों की राय, आत्मनिर्णय और मानवाधिकार जैसे सिद्धांत उतने मजबूत नहीं थे।
आज का अंतर्राष्ट्रीय सिस्टम पूरी तरह बदल चुका है। इसलिए पुराने उदाहरणों को आज के कानून पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। इस पूरे मामले में रूस के राष्ट्रपति पुतिन की एंट्री और उनके मजाकिया तंज ने भी खूब सुर्खियां बटोरी।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी ट्रंप के बयान पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड का मालिकाना हक रूस के लिए मायने नहीं रखता और यह अमेरिका और डेनमार्क का मामला है।
लेकिन उन्होंने मजाकिया लहजे में ग्रीनलैंड की कीमत 200-250 मिलियन डॉलर बताई। साथ ही डेनमार्क पर “कॉलोनियल ट्रीटमेंट” का आरोप भी लगाया।
असल में, पुतिन का बयान भी इस बात की ओर इशारा करता है कि यह मुद्दा सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन, NATO, यूरोप और आर्कटिक क्षेत्र की राजनीति से जुड़ा है।
आइए अब समझते हैं वो तरीका जिसके जरिए किसी देश की जमीन को हथियाना या लेना संभव है। यहां मैंने हथियाना शब्द का इस्तेमाल क्यों किया है इसका जवाब भी आपको मिल जाएगा।
दरअसल, आज के दौर में सीधे खरीद मुश्किल है, लेकिन एक नया तरीका सामने आया है- 'डेट ट्रैप डिप्लोमेसी'। इसमें क्या होता है? कोई बड़ा देश किसी छोटे देश को भारी कर्ज देता है। जब छोटा देश कर्ज नहीं चुका पाता, तो उसे बंदरगाह, द्वीप या रणनीतिक ठिकाने लीज पर देने पड़ते हैं।
चीन पर कई देशों के साथ ऐसा करने के आरोप लगते रहे हैं। यानी सीधे खरीद नहीं, लेकिन आर्थिक दबाव के जरिए रणनीतिक कंट्रोल।
तो निष्कर्ष क्या है?
आज के दौर में कोई देश किसी दूसरे देश को सिर्फ पैसे देकर खरीद नहीं सकता। संप्रभुता, आत्मनिर्णय, और अंतर्राष्ट्रीय कानून ऐसी किसी भी डील को बेहद जटिल और लगभग नामुमकिन बना देते हैं।
ट्रंप का ग्रीनलैंड बयान कानूनी से ज्यादा राजनीतिक और रणनीतिक दबाव की कोशिश माना जा रहा है। यानी आज देश कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि लोगों की पहचान, अधिकार और संप्रभुता का सवाल हैं।