बाड़ाहाट के थाेलू पांचवी सांस्कृतिक संध्या की अंतिम प्रस्तुति में संवेदना समूह की ओर से प्रस्तुत कचडू देवता नाटक का मंचन देख दर्शक भावविभोर हो उठे। कलाकारों ने डुंडा क्षेत्र के आराध्य देव कचडू के जीवन पर आधारित मंचन के दौरान अपने अभिनय से नाटक के पात्रों को मंच पर जीवंत किया। इस दौरान कचडूू के घर से बहिन लेने के लिए जाना और उसके बाद आछरियों की ओर से अपने साथ ले जाने दृश्यों का सुंदर प्रस्तुतीकरण कलाकारों की ओर से किया गया। नाट्य दल संवेदना समूह की ओर से कचडू देवता नाटक का दिया-पाथा परंपरा के साथ शुभारंभ किया गया। उसके बाद समूह के कलाकारों ने देवजागरों और बेडृ पाको बारामास आदि गीतों पर सुंदर प्रस्तुती दी। उसके बाद कचडू देवता के मंचन में उनके जीवनी को मंच पर जीवंत किया गया। नाटक में कचडू और उनकी मां बलेती के बीच मां-बेटे का प्यार सहित कचडू और उनके दिव्यांग दोस्त मंगती के बीच गहरी दोस्ती का मंचन कर कलाकारों ने उनके पात्रों का मंच पर जीवंत किया गया। साथ ही यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार कचडू अपनी मां का आशीवार्द लेकर बहिन सोभना को लेने के लिए बरसाली रवाना होते हैं। इस दौरान उनके रंग-रूप को देखकर मोहित परिलोक की आछंरियां उन्हें अपने साथ ले जाती हैं और कचडू को अपने लोक में रहने के लिए कहती हैं। कचडू कहता है कि उनकी मां की मदद करने वाला कोई नहीं। इस पर आछारियां शर्त के साथ कचडू की मां के काम में उसके साथ मदद करती हैं। साथ ही कहती हैं कि उन्हें कोई देख नहीं पाए। लेकिन एक दिन कचडू की मां उसे देख लेती है और उसके बाद कचडू देवता बन जाते हैं और आज भी पश्वा पर अवतरित और डोली और ढोल के रूप में अपने श्रद्धालुओं की मनाकामनाएं पूरी करते हैं।