पोखरी। आधुनिक कृषि उपकरणों, सिंचाई सुविधाओं और सरकारी संसाधनों के अभाव में पहाड़ के काश्तकार आज भी परंपरागत तरीकों से खेती करने को मजबूर हैं। कठिन मेहनत के बावजूद खेती से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने के कारण युवाओं का रुझान भी कृषि से लगातार कम होता जा रहा है। इसके बावजूद ग्रामीण अपने पूर्वजों की परंपरा को जीवित रखते हुए धान की रोपाई में जुटे हुए हैं। विकासखंड के विरसण सेरा ग्राम पंचायत के चेमड़ा गांव में इन दिनों धान रोपाई का कार्य चरम पर है। गांव के पास बहने वाले छोटे से गदेरे के सीमित जलस्रोत पर ही पूरी खेती निर्भर है। पानी की कमी के कारण ग्रामीण बारी-बारी से रातभर अपने खेतों में पानी छोड़ते हैं। खेतों में पर्याप्त पानी भरने के बाद बैलों से हल चलाकर उन्हें रोपाई के लिए तैयार किया जाता है। ग्रामीण काश्तकार सत्येंद्र सिंह नेगी और विक्रम सिंह नेगी बताते हैं कि धान की खेती की शुरुआत ‘बिजवाण’ तैयार करने से होती है। पहले चयनित खेतों में धान का बीज बोया जाता है। पौधे तैयार होने पर महिलाएं उन्हें सावधानीपूर्वक उखाड़कर रोपाई के लिए तैयार करती हैं। इसके बाद गांव की महिलाएं घंटों तक पानी से लबालब खेतों में खड़े होकर धान की रोपाई करती हैं। चेमड़ा गांव में आज भी सामूहिक श्रम और आपसी सहयोग की पुरानी परंपरा कायम है। ग्रामीण एक-दूसरे के खेतों में मिलकर हल लगाते हैं और रोपाई का कार्य पूरा करते हैं। यही सामूहिकता खेती को जीवित रखने का सबसे बड़ा आधार बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सिंचाई नहरों का निर्माण हो, आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराए जाएं और किसानों को समय पर तकनीकी सहायता मिले तो पहाड़ की खेती अधिक लाभकारी बन सकती है