(श्रुतिमान शुक्ल)। कभी दशहरी के नाम पर मशहूर मलिहाबाद की गूंज बाराबंकी की मंडियों में सुनाई देती थी, लेकिन वक्त ने करवट क्या ली...अब खुद बाराबंकी का आम देश-विदेश में अपनी खुशबू बिखेर रहा है। याकूती, हुस्नआरा, गुलाबखास, मालदा और फजली जैसी खास किस्में अब मैंगो लवर्स की पहली पसंद बन चुकी हैं और दाम... 300 से लेकर 600 रुपये प्रति किलो तक! विदेशों तक इसकी मांग का आलम ये है कि दुबई समेत कई खाड़ी देशों को जाने वाला बाराबंकी का आम इस बार भी जिले से आम जापान और न्यूजीलैंड तक भेजा जाएगा है। मसौली हाईवे पर 'मैंगो मेला' बाराबंकी-बहराइच हाईवे पर जैसे-जैसे आप मसौली की ओर बढ़ते हैं, आमों की महक और रंग-बिरंगी टोकरी आपका रास्ता रोक लेती है। सड़क किनारे मंडियों में सजे पीले, लाल और हरे आम किसी उत्सव की तरह नजर आते हैं। यहां के दुकानदारों की आवाजें भी उतनी ही मीठी होती हैं... दुकानदार जोर-जोर से चिल्लाते हैं आओ भइया, याकूती ले लो, 400 से शुरू है! स्थानीय विक्रेता मोहर्रम अली और इरशाद ने बताया कि इस बार आम खूब लदे हैं और विदेशों तक जा रहे हैं। 12,250 हेक्टेयर में फैली आम की दुनिया बाराबंकी में 12,250 हेक्टेयर ज़मीन पर आम के बाग हैं। और किस्में... 50 से भी ज्यादा। दशहरी, आम्रपाली, चौसा, लंगड़ा, अलफांजो से लेकर थाईलैंड की हाइब्रिड वैरायटी तक—हर स्वाद, हर पसंद का आम यहां मिलता है। अंतरराष्ट्रीय मानकों पर परखा जा चुका आम रहमानखेड़ा स्थित मैंगो हाउस तक जब जापान का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा, तो उन्होंने यहां के आमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर परखा। खुश होकर बाराबंकी के आम को एक्सपोर्ट अप्रूवल भी दे दिया। अब यही याकूती और गुलाबखास टोक्यो और ऑकलैंड की दुकानों में बिक रहा है। आम के सीजन में नहीं खाई जाती मिठाई बाराबंकी में जब आम आता है, तब मिठाई नहीं खाई जाती। मसौली क्षेत्र की ये कहावत आज भी सच है। जब आम का सीजन आता है, तो यहां हर गली, हर चौराहा मैंगो मंडी में तब्दील हो जाता है। और मिठास? ऐसी कि शहद भी फीका लगने लगे।