पश्चिम बंगाल की राजनीति में वह हो गया, जिसकी कभी तृणमूल कांग्रेस ने कल्पना भी नहीं की होगी। ममता बनर्जी की पार्टी में अब तक की सबसे बड़ी बगावत सामने आई है। काकोली घोष और सुदीप बंद्योपाध्याय की अगुवाई में 20 लोकसभा सांसद टीएमसी से अलग हो गए हैं और उन्होंने अपना नया सियासी ठिकाना नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई को बना लिया है। लेकिन असली सवाल अब यह है कि क्या ये बागी सांसद सिर्फ पार्टी छोड़कर जाएंगे या फिर ममता बनर्जी से उनकी ही बनाई पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह 'जोड़ा फूल' भी छीन सकते हैं?
टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों का अलग होना ममता बनर्जी के लिए सिर्फ राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी चुनौती भी है। बागी खेमे ने साफ कर दिया है कि उनका अगला लक्ष्य खुद को 'असली टीएमसी' साबित करना है। सुदीप बंद्योपाध्याय ने संकेत दिए हैं कि जुलाई में उनका गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा करेगा।
हालांकि, बागी नेताओं ने फिलहाल एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना है। इसकी वजह दल-बदल विरोधी कानून से बचना है। दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होने पर उन्हें संसद की सदस्यता खोने का खतरा नहीं रहेगा।
अब नजर चुनाव आयोग और लोकसभा स्पीकर की भूमिका पर है। बागी सांसदों ने स्पीकर से अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है और एनडीए को समर्थन देने के संकेत भी दिए हैं। दूसरी तरफ ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने मोर्चा संभाल लिया है। अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर बागी गुट को मान्यता नहीं देने और अधिकृत व्हिप का पालन कराने की मांग की है।
लेकिन सवाल यह है कि कानून किसके पक्ष में खड़ा है?
किसी राजनीतिक दल पर दावे का फैसला 'इलेक्शन सिंबल्स ऑर्डर, 1968' के पैराग्राफ-15 और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' फैसले के आधार पर होता है। चुनाव आयोग मुख्य रूप से तीन बातों को देखता है- निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का समर्थन, पार्टी संगठन पर नियंत्रण और पार्टी संविधान का पालन।
यहीं बागी गुट मजबूत नजर आता है। उनके पास लोकसभा में दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं और दावा है कि 80 से ज्यादा टीएमसी विधायकों में से 60 से अधिक उनके साथ हैं। यदि यह आंकड़ा साबित हो जाता है तो कानूनी रूप से उनका दावा बेहद मजबूत हो सकता है।
हालांकि, लड़ाई इतनी आसान नहीं है। पार्टी संगठन, जिला इकाइयों और जमीनी कार्यकर्ताओं पर अब भी ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ मानी जाती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के मामलों में चुनाव आयोग ने विधायकों और सांसदों के बहुमत को अधिक महत्व दिया था, लेकिन बंगाल की स्थिति अलग भी हो सकती है।
अगर चुनाव आयोग को मामला उलझा हुआ लगता है तो वह अंतरिम तौर पर टीएमसी के नाम और 'जोड़ा फूल' चुनाव चिन्ह को फ्रीज भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को नए नाम और नए चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव मैदान में उतरना पड़ सकता है।
यानी कानूनी और विधायी गणित फिलहाल बागी खेमे के पक्ष में दिखाई दे रहा है, लेकिन संगठन और जमीनी ताकत अब भी ममता बनर्जी के साथ है। इसलिए असली लड़ाई सिर्फ अदालतों में नहीं, बल्कि बंगाल की सियासी जमीन पर भी लड़ी जाएगी। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि टीएमसी सिर्फ ममता बनर्जी की पार्टी रहेगी या फिर बागी गुट 'असली टीएमसी' का तमगा हासिल कर लेगा। फिलहाल बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी जंग शुरू हो चुकी है।