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Republic Day Parade 2026: परेड में दिखे बैक्ट्रियन ऊंट की खासियत तो जान लीजिए।

अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Updated Mon, 26 Jan 2026 07:07 PM IST

26 जनवरी 2026 को भारत ने अपना 77वां गणतंत्र दिवस पूरे उत्साह और गौरव के साथ मनाया। कर्तव्य पथ पर आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में देश की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और रणनीतिक क्षमताओं का भव्य प्रदर्शन हुआ। इस बार परेड का सबसे खास आकर्षण बने दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंट, जिन्हें पहली बार कर्तव्य पथ पर शामिल किया गया।

ये खास ऊंट, जिन्हें मंगोलियाई ऊंट भी कहा जाता है, भारतीय सेना की कोल्ड डेजर्ट रणनीति की नई पहचान बनकर सामने आए। पूर्वी लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में तैनात ये ऊंट अब देश की सीमाओं पर सेना के भरोसेमंद साथी बन चुके हैं।

क्यों सेना में शामिल किए गए बैक्ट्रियन ऊंट?

भारतीय सेना आधुनिक तकनीक, ड्रोन और हाई-टेक हथियारों के साथ-साथ पारंपरिक और प्राकृतिक संसाधनों को भी रणनीति का हिस्सा बना रही है। पूर्वी लद्दाख की भौगोलिक परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं, जहां ऊंचाई, भीषण ठंड और सीमित संसाधन सेना की लॉजिस्टिक व्यवस्था को कठिन बना देते हैं।

ऐसे में बैक्ट्रियन ऊंट सेना के लिए एक कारगर समाधान बनकर उभरे हैं। ये ऊंट ऊंचाई वाले इलाकों में भारी सामान ढोने, पेट्रोलिंग और लास्ट माइल डिलीवरी में बेहद मददगार साबित हो रहे हैं। जहां वाहन और मशीनें कई बार जवाब दे देती हैं, वहां ये ऊंट बिना रुके अपना काम करते हैं।

क्या है बैक्ट्रियन ऊंट की खासियत?

बैक्ट्रियन ऊंट दो कूबड़ वाले होते हैं और मूल रूप से मंगोलिया व मध्य एशिया में पाए जाते हैं। ये ऊंट 15,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर भी आसानी से काम कर सकते हैं।

इनकी सबसे बड़ी खासियत है इनकी ताकत और सहनशक्ति। ये 150 से 200 किलो तक का भार उठाने में सक्षम होते हैं। माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी ये बिना किसी परेशानी के काम करते हैं।

इनके शरीर की बनावट, घना फर और मजबूत त्वचा इन्हें हड्डियां जमा देने वाली ठंड से बचाती है। यही वजह है कि इन्हें ‘कोल्ड डेजर्ट वॉरियर’ कहा जाता है।

सेना कहां कर रही है इस्तेमाल?

भारतीय सेना पिछले दो वर्षों से बैक्ट्रियन ऊंटों को पूर्वी लद्दाख के दुर्गम इलाकों में तैनात कर रही है। ये ऊंट सेना के लिए रसद पहुंचाने, गोला-बारूद और जरूरी सामान को अग्रिम चौकियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

पहले बैच में एक दर्जन से अधिक ऊंटों को सेना में शामिल किया गया है। इन ऊंटों को लद्दाख के हुंडर गांव में पाला और तैयार किया जाता है। माना जाता है कि इस नस्ल के ऊंटों को पुराने समय में सिल्क रूट के व्यापारी लद्दाख लेकर आए थे।

क्यों कहलाते हैं ‘कोल्ड डेजर्ट वॉरियर’?

अपनी असाधारण सहनशक्ति के लिए पहचाने जाने वाले बैक्ट्रियन ऊंट कई दिनों तक बिना पानी और भोजन के भी जीवित रह सकते हैं। कम ऑक्सीजन, तेज हवाएं और अत्यधिक ठंड इन सभी परिस्थितियों में ये ऊंट सेना के लिए बेहद भरोसेमंद साबित होते हैं।

इसी वजह से सेना के जवान इन्हें सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि कठिन इलाकों में तैनात अपने साइलेंट साथी मानते हैं।

भारत में कहां मिलते हैं बैक्ट्रियन ऊंट?

भारत में बैक्ट्रियन ऊंट मुख्य रूप से लद्दाख और कोल्ड डेजर्ट क्षेत्रों में पाए जाते हैं। यहां तापमान अक्सर माइनस में चला जाता है, हवा तेज होती है और ऑक्सीजन का स्तर भी कम रहता है।

ऐसे हालातों में भी ये ऊंट पूरी मजबूती से काम करते हैं। गणतंत्र दिवस परेड में इनका शामिल होना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि भारत सीमाओं की सुरक्षा के लिए हर पारंपरिक और आधुनिक ताकत का इस्तेमाल कर रहा है।
 

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