RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच लगातार झगड़े होते रहते हैं. लेकिन देश कभी टूटा नहीं, सिवाय उस एक बार के जब हिंदू भावना को भुला दिया गया था. हमारी पूजा, हमारी भाषा, सब कुछ सुरक्षित रहेगा; बल्कि, हिंदुत्व खुद उनकी सुरक्षा की गारंटी देता है, क्योंकि यही उस विचारधारा का स्वभाव है... हमें यह मानना होगा कि चाहे हम किसी प्रांत के हों, किसी देवी-देवताओं की पूजा करते हों, हमारी खाने की आदतें और रीति-रिवाज अलग हों, या हम शाकाहारी या मांसाहारी हों, हम एक समाज के नाते, एक राष्ट्र के नाते, एक संस्कृति के नाते एक हैं। हम उसे हिंदू कहते हैं। चाहे आप यह कहें या न कहें, आप जो शब्द इस्तेमाल करेंगे, वह एक ही मतलब का होगा। चाहे आप भारतीय कहें या हिंदू, बात एक ही है."
उन्होंने आगे कहा, "हम कभी किसी के धर्म का अपमान नहीं करते। यह एक हिंदू का स्वभाव नहीं है। लेकिन यह सीखना होगा.बातचीत करनी होगी। हमें बैठकर शांति से बात करनी होगी.हिंदू-मुस्लिम एकता' शब्द गलत हैं। आप उन्हें एकजुट करते हैं जो दो अलग-अलग चीजें हैं। जब वे पहले से ही एक हैं तो आप एकता की बात कैसे करते हैं? हम उस एकता को भूल गए हैं; हमें उसे फिर से याद करना है.
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, "भारत का एक संविधान है। यह भारतीय मन की वजह से बना था. देश को मुसलमानों और हिंदुओं के लिए अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया था। लेकिन अलग हुए पाकिस्तान ने खुद को मुस्लिम राष्ट्र बनाया। पाकिस्तान टूटा, बांग्लादेश बना, और वह भी आखिरकार एक मुस्लिम राष्ट्र बना। हमने अपने आपको सबका राष्ट्र घोषित किया, क्योंकि हम हिंदू हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह एक गलती थी। लेकिन यह हिंदू स्वभाव, 'वसुधैव कुटुंबकम्' की प्रकृति के कारण हुआ। हमारा संविधान, एक तरह से, धर्म के पालन का आधुनिक रूप है। हमें इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए
भागवत ने स्वदेशी पर कहा, "जो चीज़ें हमारे घरों में बनती हैं, उन्हें बाहर से नहीं लाना चाहिए। घर पर ही बढ़िया मसालेदार छाछ या नींबू पानी बनाया जा सकता है.यहां ऐसे लोग हैं जो छाछ बेचते हैं। ऐसी भारतीय कंपनियां भी हैं जो छाछ बेचती हैं. अब पुरानी प्रणालियों को ठीक वैसे ही लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि समय बदल गया है। लेकिन हम इतना तो कर सकते हैं हम जो भी खरीदें, ऐसी चीज़ें खरीदें जिनसे हमारे अपने देश में रोज़गार बढ़े।"
उन्होंने आगे कहा, "नीति स्तर पर, हम कहेंगे कि हम व्यापार करेंगे, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में लेन-देन ज़रूरी है। हम अलग-थलग नहीं रह सकते। लेकिन हम जो भी लेन-देन करेंगे, वह अपनी मर्ज़ी से करेंगे, किसी के दबाव में नहीं, और टैरिफ की वजह से नहीं। यह नीति धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है, लेकिन नीतियां अपनी गति से बदलती हैं, और यह बदलेगी। हम इसे अपने घरों में लागू करें।"