भाषण में एक ऐसा राजनीतिक शब्द भी सामने आया, जिसने स्वतंत्रता दिवस के मंच से उतरते ही सियासी बहस को गरमा दिया,‘दिमागी नक्सल’। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है, लेकिन वैचारिक स्तर पर देश को कमजोर करने वाली सोच से भी सतर्क रहने की जरूरत है। यहीं से ‘दिमागी नक्सल’ शब्द राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया। सवाल है कि प्रधानमंत्री ने लालकिले जैसे राष्ट्रीय मंच से यह शब्द क्यों चुना? क्या यह सिर्फ नक्सलवाद के बदलते स्वरूप की ओर इशारा था, या इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है?