बिहार में बड़ा खेला होने वाला है। चुनाव नतीजों के एलान के साथ वो बातें निकल कर सामने आने लगी हैं जो अब तक दबी हुई थीं। चिराग पासवान बड़ा खेल खेलने वाले हैं, कुछ रिपोटर्स ये दावा कर रही हैं कि चिराग की पार्टी जनसुराज से गठबंधन को तैयार है। तो क्या प्रशांत किशोर के सेंधमारी की कोशिश कामयाब होने वाली है। क्या चिराग पासवान अब सीट के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे हैं। सीट शेयरिंग के लिए एनडीए खेमे में अभी बैठकों का दौर चल रहा है. इस बीच सूत्रों के अनुसार, चिराग पासवान ने प्रशांत किशोर की पार्टी से संपर्क साध लिया है. खबरों के मुताबिक चिराग के इस कदम को प्रेशर पॉलिटिक्स माना जा रहा है. दरअसल, चिराग एनडीए गठबंधन में ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि चिराग 25-35 सीटों पर अड़े हुए हैं. अब एलजेपी (आर) के सूत्रों ने बताया कि उनके दरवाजे खुले हुए हैं. माना जा रहा है कि एनडीए अगले एक दो दिन में सीट बंटवारे का एलान कर सकता है. इस बीच चिराग की पार्टी की गुगली ने बिहार में एनडीए की मुसीबत बढ़ा दी है. हालांकि आपको याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले भी प्रशांत किशोर कई बार चिराग पासवान की तारीफ कर चुके हैं. अब चिराग की पार्टी के इस नए दांव ने फिलहाल राज्य में सियासी माहौल को गरमा दिया है. बिहार में चिराग की पार्टी का इतिहास का देखेंगे तो पता चलेगा कि 2020 के विधानसभा चुनाव में भी चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ा था. पिछले चुनाव में चिराग की पार्टी कुछ खास प्रदर्शन तो नहीं कर पाई थी. लेकिन एनडीए के सहयोगी जेडीयू को तगड़ा नुकसान पहुंचाया था. इस बार भी चिराग की पार्टी ने अलग राह अपनाने का संकेत देकर एनडीए को मुसीबत में तो डाल ही दिया है. माना जा रहा है कि एनडीए की तरफ से इस मसले को अब जल्द से जल्द सुलझाने की कोशिश होगी. यही हाल जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा का भी है। एलजेपी (आर) के सूत्रों की मानें तो पार्टी बिहार चुनाव में 30 से 40 सीटों पर चुनाव लड़ने का लक्ष्य लेकर चल रही है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि हमें राज्यसभा या विधान परिषद सीट की जरूरत नहीं है. चिराग पासवान शाहाबाद इलाके की किसी सीट से मैदान में उतर सकते हैं. चुनाव रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी से गठबंधन को लेकर सवाल पर एलजेपी (आर) सूत्रों का कहना है कि दरवाजे हमेशा खुले हैं. राजनीति में विकल्प हमेशा उपलब्ध रहते हैं.