ब्रह्म-कुंभ या माघ मेला के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर जो विवाद सामने आया है, उस पर योग गुरु बाबा रामदेव ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। यह विवाद मुख्यतः प्रयागराज के माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद के संगम में स्नान और उन्हें प्रशासन द्वारा नोटिस जारी करने जैसे मुद्दों को लेकर उठी टिप्पणियों के बीच उत्पन्न हुआ है। इस पूरे प्रकरण में बाबा रामदेव ने कहा कि तीर्थस्थलों और धार्मिक आयोजनों को कोई एजेंडा चलाने का मंच नहीं बनाना चाहिए। उनका मानना है कि पवित्र स्थानों की गरिमा और धार्मिकता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है और अगर कोई व्यक्ति या समूह अपने व्यक्तिगत या वैचारिक एजेंडा के साथ इन स्थलों पर आता है तो यह गलत और अनुचित है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि मेले में अहंकार लेकर आने की बजाय सभी को अहंकार त्यागकर, शांति और अध्यात्म के उद्देश्य से ही धार्मिक आयोजन में शामिल होना चाहिए। इस बयान में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ लोग तीर्थस्थलों पर भी किसी न किसी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करते दिख रहे हैं, जो कि धर्म की पवित्रता के लिए नुकसानदेह है।
बाबा रामदेव ने अविमुक्तेश्वरानंद के मामले को केवल प्रशासनिक या वैचारिक विवाद के रूप में न देखते हुए कहा कि धार्मिक आयोजनों और पवित्र स्थलों पर धर्म और अध्यात्म की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली हर कोशिश से सावधान रहना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि लोगों को अपने व्यक्तिगत विचारों और अहंकार को पीछे छोड़कर इस तरह के मेलों में शांति, प्रेम और अध्यात्म का अनुभव करना चाहिए। इसके अलावा उनका यह भी मानना है कि ऐसे विवादों से धार्मिक समुदाय में अनावश्यक तनाव और मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं, जो सामाजिक और सांस्कृतिक बलबाढ़ की भावना को प्रभावित करते हैं।
रामदेव का दृष्टिकोण इस पूरे विवाद में संतों और प्रशासन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की ओर केंद्रित रहा है। उन्होंने यह भी संकेत किया कि पवित्र आयोजनों को राजनीतिक या वैचारिक विवादों का हिस्सा बनाना गलत है और सभी को धर्म के मूल उद्देश्य — शांति, भक्ति और साधना — पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उनकी टिप्पणियाँ असल में इस सन्दर्भ को पार करते हुए स्पष्ट करती हैं कि धार्मिक आयोजनों में भक्ति और अनुशासन को प्राथमिकता देनी चाहिए न कि विवाद या मतभेद को।