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Rampur Bushahar News: असुरों से युद्ध करने मंदिरों से निकलते हैं देवता

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सतलुज घाटी के कुछ गांवों में 15 दिन पहले शुरू हो जाता है लोहड़ी का पर्व, मकर संक्रांति का भी पारंपरिक महत्व
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हितेंद्र शर्मा
कुमारसैन (रामपुर बुशहर)। हिमाचल प्रदेश की सतलुज घाटी में लोहड़ी और मकर संक्रांति न केवल धार्मिक पर्व हैं, बल्कि ये स्थानीय जीवन के उल्लास और परंपराओं का प्रतीक भी हैं। सतलुज घाटी के कुछ गांवों में 15 दिन पहले ही लोहड़ी का पर्व शुरू हो जाता है। वहीं, मकर संक्रांति का भी यहां पारंपरिक महत्व है। इस दिन लोग नदी या जलाशयों में पवित्र स्नान करते हैं। तत्तापानी में माह भर स्नान का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति पर तिल, गुड़, वस्त्र और अन्न का भी दान किया जाता है। यह पुण्य कमाने और दूसरों के प्रति समर्पण दिखाने का दिन माना जाता है। वहीं, माघ संक्रांति के अवसर पर सतलुज घाटी के मंदिरों में देव-असुर संग्राम की प्रतीकात्मक परंपरा का आयोजन किया जाता है। देवताओं के प्रस्तर विग्रहों पर घृतमा (घी अर्पण) किया जाता है। मंदिरों के देवता प्रतीकात्मक रूप से असुरों से युद्ध के लिए मंदिरों से बाहर निकलते हैं और गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सतलुज घाटी के क्षेत्र कुमारसैन, सांगरी और कोटगढ़ में लोहड़ी और मकर संक्रांति पर्व विशिष्ट रीति-रिवाजों और लोक परंपराओं के साथ मनाए जाते हैं। प्रकृति से जुड़े ये पर्व स्थानीय समुदाय के बीच सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण को प्रकट करते हैं।
आज घर-घर जाएंगे लोहड़ी मांगने
सोमवार को लोहड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। बच्चे और युवा लड़के-लड़कियां टोली बनाकर घर-घर जाकर लोहड़ी गीत गाते हैं। इसके बदले में उन्हें गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और मिठाइयां दी जाती हैं। शाम होते ही गांवों के खुले स्थानों में लकड़ियों का ढेर जलाया जाता है। लोग अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए तिल, गुड़ और मूंगफली अर्पित करते हैं। यह अग्नि सूर्य देवता और अग्नि देव की आराधना का प्रतीक होती है। लोहड़ी के मौके पर तिल, गुड़ और मूंगफली से बने व्यंजन तैयार किए जाते हैं। कुछ गांवों में पारंपरिक पकवान इस दिन की विशेष पहचान हैं। 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने और उत्तरायण होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है, जिसे शुभ कार्यों की शुरुआत के रूप में देखा जाता है। इस पर्व को सभी संक्रांति में सबसे पवित्र माना जाता है। घाटी के गांवों में इस दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
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घाटी में मांदले की परंपरा प्राचीन है। घरों के सामने मांदले सजाए जाते हैं। मकोल की मिट्टी से मांदला बनाकर देवदार के पराग कणों (पठावा) से आकर्षक रेखाएं खींची जाती हैं। मांदले के मध्य में गोबर के गणेश की प्रतिष्ठा की जाती है और द्रुबा घास से उन्हें सजाया जाता है। खिचड़ी और तिल गुड़ की मिठाइयां इस दिन माश और चावल की खिचड़ी बनाकर घी के साथ परोसी जाती है। ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को खिचड़ी दान की जाती है। मकर संक्रांति के अवसर पर कोटेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण और मंढोली में भंडारे का आयोजन होगा।
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- डाॅ. हिमेंद्र बाली, साहित्यकार एवं उच्चतर शिक्षा विभाग उप निदेशक के पद पर कार्यरत


सतलुज घाटी क्षेत्र के प्रमुख देवता सात दिन या 15 दिन बाद देव-असुर संग्राम से अपने धाम लौटते हैं, जिसे सतरैण उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान महादेव अपने प्रतिनिधि के माध्यम से युद्ध का विवरण सुनाते हैं। - अरुण भारद्वाज, राजपुरोहित, कुमारसैन रियासत

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