जलवायु परिवर्तन और सेब के उत्पादन में अधिक खर्चा आने पर बागवान ला रहे बदलाव
दीपक सूद
नेरवा (रोहड़ू)। बाजार में बेहतर दाम मिलने और कुछ वर्षों से हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण बागवानों का एक वर्ग जापानी फल की बागवानी की ओर आकर्षित हो रहा है। बागवानों का यह वर्ग अब सेब के पौधे लगाने के बजाय प्रयोग के तौर पर जापानी फल के पौधे लगा रहा है। अंग्रेजी में जापानी फल को पर्सिमान कहते हैं। कीमा-चंद्रावली के प्रगतिशील बागवान सलमान ने बताया कि सेब के पौधों के रखरखाव का खर्चा अधिक बढ़ जाने और फसलों के बार-बार टूटने के कारण लोग सेब के साथ साथ जापानी फल के पौधे भी प्रयोग के तौर पर लगा रहे हैं, ताकि यदि यह आर्थिक रूप से सेब से अधिक लाभकारी सिद्ध होते हैं, तो भविष्य में वह सेब के बजाए जापानी फल की बागवानी अपना सकते हैं। इस वर्ष दिल्ली की मंडी में गुणवत्ता के आधार पर इसकी 10 किलो की पेटी 1000 से 2250 रुपये तक बिकी। इसके रखरखाव का खर्चा भी सेब के मुकाबले नगण्य है।तीसरे वर्ष सैंपल फ्रूट व चौथे वर्ष यह फसल दे देता है। उन्होंने भी बीते वर्ष इसके 80 पौधे लगाए थे। इस वर्ष वह 120 पौधे और लगाने जा रहे हैं।
400 से अधिक है इसकी प्रजातियां
भारत के कुछ भागों में इसे तेंदू, अमरफल और रामफल भी कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम डायोस्पायरोस काकी है। इसका आकार संतरे जितना होता है। जापानी फल की 400 से अधिक प्रजातियां हैं। इनमें से हचिया और फूयु सबसे मशहूर प्रजातियां हैं। यह अलग-अलग प्रजातियों के अनुसार गहरे नारंगी, लाल व मिक्स नारंगी रंग में आता है। इसका पेड़ सेब के पेड़ की तरह होता है। पहाड़ी इलाकों में यह दो हजार फीट से सात हजार फीट की ऊंचाई पर उगाया जाता है। इसमें विटामिन ए, विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। यह हृदय के स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना जाता है। यह फल सूजन व वजन को कम करने में मदद करता है। संवाद