समुद्र तल से लगभग 9 हजार फीट की उंचाई पर बसी पराशर झील के तट पर इन दिनों भव्य सरनाहुली मेला सजा हुआ है। यह तीन दिवसीय मेला हर वर्ष आषाढ़ महीने की संक्रांति पर आयोजित किया जाता है। इस मेले में क्षेत्र के हजारों लोग अपने स्थानीय 25 से अधिक देवी-देवताओं के साथ शिरकत करने यहां पहुंचते हैं। पराशर ऋषि को समर्पित यह यहां का सबसे बड़ा लोक उत्सव है। बता दें कि इस स्थान को ऋषि पराशर की तपोस्थली कहा जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार ऋषि पराशर ने यहां पर तपस्या की थी। पराशर ऋषि के पुजारी सिद्धू राम ने बताया कि 13वीं-14वीं शताब्दी में मंडी रियासत के तत्कालीन राजा बाण सेन ने इस स्थान पर पैगोडा शैली में पराशर ऋषि के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। पराशर ऋषि को मंडी के राज परिवार का कुल देवता भी माना जाता है। उन्होंने बताया कि झील के मध्य में जो टापू है वह एक तरह से इस श्रृष्टि पर जल और पृथ्वी के अनुपात को दर्शाता है। यह टापू प्रभु इच्छा के अनुसार चलता है। कभी दिन के चार-चार चक्कर भी लगता है तो कभी वर्षों तक एक ही स्थान पर रूका रहता है। पराशर ऋषि तक पहले पैदल मार्ग से ही पहुंचा जा सकता था। यहां सड़क आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी। उस दौरान स्थानीय लोग लंबी पैदल यात्रा करके यहां पहुंचते थे। लेकिन अब यह स्थान सड़क मार्ग से जुड़ गया है जिस कारण हर बार श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में ईजाफा हो रहा है। मंदिर के पुजारी सिद्धू राम ने बताया कि इस स्थान पर मदिरापान और धूम्रपान पूरी तरह से निषेद्ध है। कुछ लोग अज्ञानतावश यहां मनोरंजन के लिए आते हैं जिन्हें समझाना पड़ता है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे यहां एक धार्मिक नजरिए से ही आएं ताकि इस स्थान की पवित्रता बनी रह सके।