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Hamirpur: गन्ने से नहीं, अब फल-सब्जियों और फॉरेस्ट वेस्ट से बनेगा इथेनॉल, मंडी की शोधार्थी का नवाचार

देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन इसके लिए गन्ने, मक्का और चावल जैसी फसलों पर बढ़ती निर्भरता और अधिक पानी की खपत बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे समय में हिमाचल प्रदेश के मंडी की शोधार्थी कृतिका शर्मा ने इथेनॉल उत्पादन की ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे फल, सब्जियों और वन अपशिष्ट (फॉरेस्ट वेस्ट) से भी इथेनॉल तैयार किया जा सकेगा। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से पीएचडी कर चुकी कृतिका शर्मा ने ग्रीन केमिकल आधारित तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के जरिए कृषि और वन अपशिष्ट का उपयोग कर पर्यावरण अनुकूल इथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पारंपरिक तकनीकों की तुलना में इसमें पानी की खपत काफी कम होती है, जिससे उत्पादन प्रक्रिया अधिक टिकाऊ और किफायती बन सकती है। इस नवाचार को एनआईटी हमीरपुर के इन्क्यूबेशन सेंटर ने चार लाख रुपये की इग्निशन ग्रांट देकर समर्थन दिया है। इस परियोजना में पालमपुर की एमबीए शोधार्थी अंजलि देवी भी सहयोगी के रूप में कार्य कर रही हैं। शोध के दौरान लैब स्तर पर तैयार इथेनॉल की लागत लगभग 60 रुपये प्रति लीटर रही है। शोधकर्ताओं का लक्ष्य इसे व्यावसायिक स्तर पर करीब 40 रुपये प्रति लीटर तक लाना है। परियोजना में पानी के पुनर्चक्रण (री-साइक्लिंग) के लिए ट्रीटमेंट प्लांट का भी प्रस्ताव शामिल है, जिससे उत्पादन लागत और पर्यावरणीय प्रभाव दोनों कम होंगे। कृतिका शर्मा ने बताया कि तकनीक का लैब स्तर पर सफल परीक्षण पूरा हो चुका है। इसके बाद पेटेंट के लिए आवेदन भी किया जा चुका है और वर्तमान में सत्यापन प्रक्रिया जारी है। उनका कहना है कि यह तकनीक केवल वाहनों के लिए स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विभिन्न उद्योगों में हरित ऊर्जा के प्रभावी विकल्प के रूप में भी उपयोगी साबित हो सकती है। एनआईटी हमीरपुर इन्क्यूबेशन सेंटर की इंचार्ज डॉ. पमिता अवस्थी ने कहा कि इथेनॉल को केवल गन्ने या अन्य कृषि फसलों से तैयार करने के बजाय कृषि और वन अपशिष्ट से बनाना अधिक टिकाऊ विकल्प है। इससे वेस्ट टू वेल्थ की अवधारणा को बढ़ावा मिलेगा, पर्यावरण संरक्षण होगा और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित होंगी।

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