प्रकृति के श्रमजीवी जंतु चींटी पर रासायनिक खेती का क्या प्रभाव पड़ रहा है। उनकी प्रजातियां घट रही हैं या इनमें बढ़ोतरी हो रही है। यह बताने अमेरिका की महिला प्रोफेसर वेलरी दून पहुंच गई हैं।
अमेरिका के वरमोंट शहर स्थित सेंट माइकल्स कालेज में जीव विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन की प्रोफेसर वेलरी को पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य पर फुल ब्राइट फेलोशिप मिली है।
शोध के लिए चार हजार डॉलर
अमेरिका की संस्था उन्हें पांच माह तक हर महीने चार हजार डॉलर शोध के लिए देगी। शनिवार को वेलरी ने अमर उजाला को बताया कि रासायनिक खेती का स्वास्थ्य पर काफी दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
इस विषय पर अमेरिका में कई शोध हो चुके हैं। बताया कि वह रासायनिक खेती के चींटियों पर असर पर भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक डा. वीपी उनियाल के मार्गदर्शन में शोध करेंगी।
यह होगा शोधस्थल
शिमला बाईपास स्थित नवदान्य संस्थान जहां जैविक खेती की जाती है। इसके अलावा वेलरी रासायनिक खेती वाले क्षेत्र बड़ोवाला और राजाजी नेशनल पार्क से सटे वन क्षेत्र में शोध करेंगी।
देश में चींटी की 625 प्रजातियां
भारत में चींटी की 625 प्रजातियां होने का आकलन किया गया है। हालांकि, हिमालयी क्षेत्र में चींटी की कितनी प्रजातियां हैं, इस पर कोई शोध नहीं हुआ है। इस पर शोध हुआ तो नई जानकारी मिल सकती है।
किसानों की मित्र है चींटीः
चींटी किसानों की मित्र है। चींटी के कारण खेतों की उत्पादन क्षमता बढ़ती है। उनके द्वारा खेतों में घर बनाने से मिट्टी की गुणवत्ता में बढ़ती है, जिससे मिट्टी उपजाऊ भी होती है।
मैं पहले भी दून आ चुकी हूं। यहां जैविक और रासायनिक दोनों तरह की खेती होती है। ऐसे में यहां शोध करना आसान होगा। अमेरिका में भी छोटे किसान ही जैविक खेती कर रहे हैं।
इनकी भी सुनिएः
बड़े किसान मोटी कमाई के लिए रासायनिक खेती करते हैं। हालांकि किसान अब जैविक खेती के लिए जागरूक होने लगे हैं। वे समझ रहे हैं कि रसायन मानव शरीर के लिए घातक हैं।
-वेलरी, प्रोफेसर सेंट माइकल्स कालेज अमेरिका
विदेशों के मुकाबले भारत में जबर्दस्त जैव विविधता है। चींटी पर अध्ययन करने के लिए वेलरी का मेरे पास प्रस्ताव आया था, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। अगले सप्ताह से वह शोध शुरू कर देंगी।
-डा. वीपी उनियाल, वैज्ञानिक भारतीय वन्यजीव संस्थान