आपदा के बाद अभी तक गंगोत्री हाईवे से 18 किमी पैदल दूरी वाले पिलंग तथा जौड़ाव गांव के लोगों की जिंदगी पटरी पर नहीं लौटी है। पिलंग तथा जौड़ाव गदेरे पर पुल बहने पर ग्रामीणों ने श्रमदान कर लकड़ी की पुलिया बनाई है।
वर्ष 2005 की आपदा में पिलंग तथा 2012 में जौड़ाव गांव के पुल बह गए थे। आपदा मद में पिलंग के लिए लगाई ट्राली भी 2013 की बाढ़ में बह गई।
सरकारी मदद नहीं मिलने से गांव वाले श्रमदान कर हर साल जाड़ों में पुलिया तैयार करते हैं। बरसात में पुलिया बह जाने के बाद ग्रामीा कई किमी का अतिरिक्त चक्कर काटकर आवाजाही कर रहे हैं।
यही स्थिति जौड़ाव की भी है। गांव के लोग श्रमदान करके हर साल पुलिया तैयार करते हैं। राजमा, रामदान, घी, अखरोट उत्पादन तथा भेड़ बकरी पाल कर आजीविका चलाने वाले इन दोनों गांव के लोगों को माल बाजार लाने तथा गांव तक खाद्यान्न पहुंचाने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
गांव से गंगोत्री हाईवे को जोड़ने वाली पगडंडी भी ठीक से चलने लायक नहीं है। चारधाम विकास परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष सूरतराम नौटियाल तथा भाजपा के पूर्व जिला महामंत्री जगमोहन रावत ने बताया कि सरकार ध्यान नहीं दी रही है। ग्रामीणों को स्वयं ही पुलिया बनाकर आवाजाही का इंतजाम करना पड़ रहा है।
गांव के देवेंद्र, लक्ष्मण, बचन सिंह, विक्रम सिंह का कहना है कि पिलंग गाड पार करके ही हमारी भेड़-बकरियां जंगल जाती है। पुलिया बहने से जंगलों से जान जोखिम में डालकर बाजार पहुंचते हैं।