पंचकोषी वारुणी यात्रा उत्तरकाशी की एक ऐसी यात्रा है, जिसमें पग-पग चलने पर श्रद्धालुओं को अश्वमेघ यज्ञ का पुण्य लाभ मिलता है। 15 किमी पैदल दूरी वाले यात्रा मार्ग पर 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। यात्रा पर उत्तरकाशी ही नहीं, अन्य जिलों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
संग्राली गांव के परमानंद शास्त्री ने बताया कि यात्रा का उल्लेख स्कंदपुराण के केदारखंड में भी हैं। उन्होंने बताया कि पहले इस यात्रा पर साधु-संत जाते थे। धीरे-धीरे पुराणों के अध्ययन के बाद आम लोग भी यात्रा पर जाने लगे हैं। अब हर साल यात्रा भव्य रूप लेती जा रही है।
बड़ेथी से शुरू होती है यात्रा
पंचकोषी वारुणी यात्रा एक दिन की है, जो वरुणा एवं भागीरथी के संगम बड़ेथी से शुरू होती है। करीब 15 किमी लंबी इस पदयात्रा के पथ पर श्रद्धालु बड़ेथी संगम स्थित वरुणेश्वर, बसूंगा में अखंडेश्वर, साल्ड में जगतनाथ, अष्टभुजा दुर्गा, ज्ञाणजा में ज्ञानेश्वर एवं व्यास कुंड, वरुणावत शीर्ष पर शिखरेश्वर, विमलेश्वर महादेव, संग्राली में कंडार देवता, पाटा में नर्वदेश्वर मंदिर के दर्शन के बाद गंगोरी पहुंचते हैं। असीगंगा और भागीरथी में स्नान के बाद उत्तरकाशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक करते हैं। यहां यात्रा का समापन होता है।
इस बार पांच अप्रैल को होगी वारुणी यात्रा
वारुणी यात्रा इस बार पांच अप्रैल को होगी। यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले गांवों के ग्रामीण यात्रा की तैयारी में जुट गए हैं। बसुंगा, साल्ड, ज्ञाणजा, संग्राली, पाटा एवं गंगोरी के ग्रामीण श्रद्धालुओं की खूब आवभगत करते हैं। ग्रामीणों द्वारा मार्ग पर भंडारे का आयोजन किया जाता, जिसमें श्रद्धालुओं को आलू के गुटखे, चाय एवं चौलाई के लड्डू परोसे जाते हैं। ग्राम प्रधान साल्ड राजेश सिंह राणा, संग्राली की सुनीता भट्ट, पाटा की राजेंद्री चौहान ने प्रशासन से यात्रा मार्ग पर जलापूर्ति, मेडिकल कैंप आदि लगाने की मांग की है।