सरकारी उपेक्षा तथा विपणन की ठोस व्यवस्था के अभाव में रवाईं घाटी के काश्तकारों का टमाटर की खेती से मोह भंग होता जा रहा है।
इस साल क्षेत्र में उत्पादित 15 हजार टन टमाटर कौड़ियों के भाव बिकने से किसानों को घाटा उठाना पड़ा। बेमौसमी बरसात ने भी टमाटर की फसल को खासा नुकसान पहुंचाया।
अब टमाटर उत्पादन को लेकर असमंजस की स्थिति में पहुंचे किसानों ने सरकार से टमाटर का भी समर्थन मूल्य घोषित करने और इसके फसल बीमा के दायरे में लाने की मांग की है।
जिले की रवाईं घाटी बड़े पैमाने पर टमाटर उत्पादन के लिए भी जानी जाती है। हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क) के सहयोग से क्षेत्र के किसानों ने टमाटर उत्पादन को आजीविका का जरिया बनाया।
वर्तमान में रवाईं घाटी फल एवं सब्जी उत्पादक एसोसिएशन से ही करीब पांच सौ किसान जुड़े हैं, जो साल में करीब बीस हजार टन टमाटर का उत्पादन कर रहे हैं।
इस साल बेमौसमी बारिश से टमाटर को खासा नुकसान पहुंचाया। रही सही कसर विपणन के ठोस इंतजाम न होने से पूरी हो गई।
करीब बीस फीसदी टमाटर तो मदर डेयरी ने औसत दस रुपये किलो की दर से खरीद लिया, लेकिन शेष फसल किसानों को 2 से 5 रुपये प्रति किलो की दर से देहरादून, विकासनगर एवं सहारनपुर की मंडियों में बेचनी पड़ी।
रवाईं घाटी फल एवं सब्जी उत्पादन एसोसिएशन के अध्यक्ष जगमोहन सिंह चंद, सुरेश रमोला, राजेश चंद, चैन सिंह, मोहन सिंह आदि का कहना है कि इस बार टमाटर से बीज, खाद का पैसा निकालना भी मुश्किल हो गया।
मौसम की बेरुखी और हर साल नई बीमारी टमाटर को खासा नुकसान पहुंचा रही है। सरकार की ओर से न तो समय पर छिड़काव के लिए दवाएं मिल पा रही हैं और न ही तकनीकी सहयोग।