गंगोत्री धाम की यात्रा पर आए हैं, तो हर्षिल में ठहर कर प्रकृति का लुत्फ उठाने से वंचित न रहें। हिमाच्छादित चोटियों का नजारा और सेब बागानों के बीच एक दर्जन से अधिक धाराओं में बंटकर जालंधरी व ककोड़ागाड का गंगा भागीरथी के साथ संगम बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। बगोरी गांव में भोटिया समुदाय की संस्कृति की झलक पाने के साथ ही हस्त निर्मित ऊनी वस्त्र भी खरीद सकते हैं।
पुराणों के अनुसार जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु यहां शिला रूप में परिवर्तित हो गए थे। यहां लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास गंगा भागीरथी में उस शिला के दर्शन भी किए जा सकते हैं और इसी वजह से इस स्थान का हरि शिला और अब हर्षिल पड़ा।
हिमाचल सीमा से लगे ग्लेशियरों से निकलती जालंधरी नदी हर्षिल से पहले खूबसूरत झरनों और बाद में सेब बागानों के बीच एक दर्जन से अधिक धाराओं में बंटकर गंगा भागीरथी से संगम करती है।
हर्षिल से लगे जाड भोटिया समुदाय के बगोरी गांव में बौद्ध मंदिर तथा प्राचीन स्थापत्य कला को सहेजे लकड़ी के भवन आकर्षित करते हैं। गंगा का शीतकालीन प्रवास मुखबा, धराली व छोलमी भी चंद कदमों की दूरी पर होने से श्रद्धालु यहां गंगा मंदिर, कल्प केदार व पंचमुखी महादेव मंदिर दर्शन का पुण्य लाभ भी अर्जित कर सकते हैं।
विदेशियों को भी ठहरने की अनुमति मिले
उत्तरकाशी। होटल एसोशिएसन के अध्यक्ष अजय पुरी व शैलेंद्र मटूड़ा बताते है कि यूं तो यहां बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं, लेकिन इनर लाइन की बंदिश के चलते विदेशी पर्यटकों के रात में रुकने पर पाबंदी से पर्यटन व्यवसायियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।